नई दिल्ली. क्या अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की राहें जुदा हो गई हैं? पुणे में अन्ना के बयान के बाद ऐसी बात कही जा रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले इन दोनों 'सिपाहियों' के बीच मतभेद इतने 'गहरे' हो गए हैं कि अब दोनों के रास्ते अलग हैं। पुणे में मंगलवार को अन्ना ने साफ किया कि वे खुद न तो कोई राजनीतिक पार्टी ही बनाएंगे और न ही चुनाव लड़ेंगे। अन्ना से जब पूछा गया कि क्या वे अरविंद केजरीवाल (अरविंद केजरीवाल से उम्मीदों और नाउम्मीदी के 9 कारण, पढ़ें) की पार्टी का समर्थन करेंगे तो इसके जवाब में उन्होंने कहा, 'हमारे मकसद एक हैं, सिर्फ रास्ते अलग-अलग हैं। अगर अरविंद कोई राजनीतिक पार्टी बनाते हैं तो मैं सिर्फ अच्छे उम्मीदवारों का समर्थन करूंगा, सबका नहीं।' (पढ़ें: जंतर मंतर पर 'जंग' खत्म, अब राजनीति के मैदान में)
दोनों के बीच मतभेद की बात को इसलिए भी बल मिल रहा है क्योंकि अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को घोषणा की थी कि अन्ना हजारे के कहने पर उन्होंने देश में एक सर्वे कराया। इस सर्वे में यह नतीजा निकलकर सामने आया है कि 76 फीसदी लोग (आईएसी का दावा, 76 फीसदी लोग राजनीतिक पार्टी के हक में, पढ़ें) चाहते हैं कि हम लोग राजनीतिक पार्टी बनाएं। लेकिन अन्ना (पढ़ें: अन्ना ने टीम भंग की, न चुनाव लड़ेंगे न पार्टी बनाएंगे) इस सर्वे के नतीजे से संतुष्ट नहीं दिख रहे हैं। शायद यही वजह है कि अन्ना ने मंगलवार को कहा कि वे देश भर में घूमेंगे और जनता के बीच जाकर यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि आंदोलन का भविष्य क्या होना चाहिए। अगर अन्ना अरविंद पर पूरी तरह से भरोसा करते तो शायद उनके सर्वे को ही आधार मानकर उनके रुख का समर्थन कर देते। लेकिन अन्ना के बयानों से लग रहा है कि कभी उनके करीब रहे अरविंद और उनकी राहें जुदा हो गई हैं।
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