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भारत-चीन सीमा पर तनाव की नई वजह 'यारसंगुबा'

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50 साल पहले 20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारत पर हमला किया था। एक महीने चली इस लड़ाई में भारत को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था। चीनी सेना भारत के अंदर घुस रही थी और असम के तेजपुर शहर को रातों रात खाली करा लिया गया था। 19 नवंबर 1962 को भारतीय सेना की फोर्थ कोर को वापस गुवाहटी लौटने के आदेश दे दिए गए थे। (पढ़ेः 80 फीसदी चीनी नागरिकों को नहीं है भारत से युद्ध की जानकारी)

 
ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसे तेजपुर को भी खाली कराने के आदेश दे दिए गए थे। हालात इतने भयावह थे कि तेजपुर से लौटते वक्त भारतीयों ने नुनमती रिफाइनरी को भी उड़ा दिया था। भारतीय स्टेट बैंक ने नोटों को आग के हवाले कर दिया था और सिक्कों को तालाब में डाल दिया था। शहर के मनोरोग अस्पताल को भी खुला छोड़ दिया गया था और रोगी सड़कों पर टहल रहे थे। जिला प्रशासन छिन्न-भिन्न हो गया था। मजिस्ट्रेट ने अपनी पोस्ट छोड़ दी थी। राणा केडीएन सिंह को तेजपुर की व्यवस्था संभालने को कहा गया और उन्होंने आनन-फानन में लोगों को ब्रह्मपुत्र पार करवाई। जो लोग वहां रह गए उन्हें चाय के बागानों और जंगलों में छिपकर वक्त गुजराना पड़ा। एक ही दिन में तेजपुर भुतहा कस्बे में बदल में गया था। 
 
19 नवंबर को आधी रात के वक्त चीनी रेडियो ने युद्ध विराम की घोषणा की। चीन की ओर से कहा गया कि अगर भारतीय सेना आगे नहीं बढ़ी तो चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार युद्ध शुरू होने से पहले की स्थिति पर चली जाएगी।  20 नवंबर को युद्ध विराम की घोषणा हो गई और इसके बाद तेजपुर में दोबारा जिंदगी पटरी पर आने लगी। तत्कालीन गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री अगले ही दिन तेजपुर पहुंचे और हवाई दौरा भी किया। 22 नवंबर को इंदिरा गांधी ने भी तेजपुर का दौरा किया। प्रधानमंत्री नेहरू ने भी असम के लोगों को संबोधित किया और उनमें भरोसा जगाने की कोशिश की। 
 
(तस्वीरः तेजपुर खाली करके जाते नागरिक)

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