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"लानत हो सआदत हसन मंटो पर,कमबख़्त को गाली भी सलीक़े से नहीं दी जाती..."

मनोज कुमार झा/अमृत सिंह | Dec 03, 2012, 14:30PM IST

बदनाम लेखक मंटो पर उनके जीवन काल में ही कई किताबें लिखी गईं। मुहम्मद असदुल्लाह की किताब 'मंटो-मेरा दोस्त' और उपेन्द्रनाथ अश्क की 'मंटो-मेरा दुश्मन'। मशहूर आलोचक मुहम्मद हसन अस्करी ने लिखा है, "(मंटो) की दृष्टि में कोई भी मनुष्य मूल्यहीन नहीं था। वह हर मनुष्य से इस आशा के साथ मिलता था कि उसके अस्तित्व में अवश्य कोई-न-कोई अर्थ छिपा होगा जो एक-न-एक दिन प्रकट हो जाएगा। मैंने उसे ऐसे अजीब आदमियों के साथ हफ़्तों घूमते देखा है कि हैरत होती थी। मंटो उन्हें बर्दाश्त कैसे करता है! लेकिन मंटो बोर होना जानता ही न था। उसके लिए तो हर मनुष्य जीवन और मानव-प्रकृति का एक मूर्त रूप था, सो, हर व्यक्ति दिलचस्प था। अच्छे और बुरे, बुद्धिमान और मूर्ख, सभ्य और असभ्य का प्रश्न मंटो के यहां ज़रा भी न था। उसमें तो इंसानों को कुबूल करने की क्षमता इतनी अजीब थी कि जैसा आदमी उसके साथ हो, वह वैसा ही बन जाता था।"


 


इस विवरण से समझा जा सकता है कि मंटो कैसे उन किरदारों को अपने अफ़सानों में केंद्रीय भूमिका देने में कामयाब हो पाया जो ज़िंदगी के सियाह हाशिये में गर्क थे। रंडियां, उनके दलाल, शोहदे, परले दर्जे के अय्याश और पियक्कड़, अधेड़ कामुक औरतें, लौंडेबाज, वेश्याओं पर अपनी मिल्कियत लुटा देने वाले रईसजादे और उनके लिए अपनी जान तक कुर्बान करने का माद्दा रखने वाले स्वामी-भक्त गुंडे। मंटो के किरदार तलछट में रहने वाले हैं, गटर में। बदबू, सड़ांध मारता माहौल, वासना में डूबे हुए लोग जिनका चरित्र बाहर से पूर्णत: घृणित दिखाई पड़ता है, पर जब हम उस किरदार के भीतर जाते हैं तो महसूस करते हैं कि वे पतित नहीं हैं, बल्कि मानवीय बोध और संवेदना से लबरेज हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि मंटो मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखता है, इस दृष्टि से वह महान मानवतावादी लेखक है। मंटो की रचनाओं के पढ़ने के बाद यह कहना कि वह प्रकृत यथार्थ का चित्रण करता है, सही नहीं होगा। वैसे, मंटो पर फ्रांसीसी प्रकृत यथार्थवादियों का प्रभाव है। मंटो में गहरी राजनीतिक अंतर्दृष्टि है। कई कहानियों में राष्ट्रीय आंदोलन के ऐसे जीवंत चित्रण हैं जो आंदोलन की प्रकृति को निर्धारित करते हैं। मंटो की कई कहानियां विभाजन की त्रासदी पर हैं और उनमें स्पष्ट पॉलिटिकल टोन है। इस दृष्टि से मंटो अपने समय से काफी आगे नज़र आते हैं।


 


मंटो के समग्र साहित्य का संकलन करने और उनकी कई गुमशुदा रचनाओं को ढूंढ निकालने वाले बलराज मेनरा ने 'सआदत हसन मंटो, दस्तावेज़-1' में लिखा है, "इस सृष्टि में अंधेरे और उजाले की लड़ाई कितने युगों से जारी है। मंटो ने इस लड़ाई का दृश्य उन आदमियों के कुरुक्षेत्र में भी देखा जो अंधेरों के वासी थे। हमारे परंपराबद्ध और नैतिक मूल्यों के टिमटिमाते दीये, जिन्होंने अंधे क़ानूनों के जन्म दिया था, उस अंधेरी दुनिया तक उन दीयों की रोशनी पहुंचने में असमर्थ थी। शायद इसीलिए मंटे उर्दू भाषा का सबसे ज़्यादा बदनाम साहित्यकार है जिसे सबसे ज़्यादा ग़लत समझा गया। क़ानून अंधे थे, मगर वे आंखें जिनसे फ़रंगी हुकूमत या ख़दा की बस्ती के तथाकथित बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नैतिक उत्तरदायित्व की झूठी और पाखंडपूर्ण धारणा का झंडा ऊंचा करने वाले नागरिकों कथा साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों के चेहरे सजे हुए थे, क्या वे आंखें भी अंधी थीं? और वे साहित्य समालोचक, नैतिकता के वे प्रचारक जिन्होंने साहित्य को पने विद्वेषों के प्रकाशन का एक आसानी-से-उपलब्ध माध्यम समझ रखा था, और जो लकड़ी की तलवारों के मंटो का सर क़लम करने की धुन में मगन रहे, आखिर वे क्या देख रहे थे?


यह सवाल हमारा नहीं, और न ही नवयुग के सांस्कृतिक मूल्यों का है।


यह सवाल मंटो की प्रताड़ित कहानियों, उन कहानियों के चरित्रों -


'काली शलवार' की सुलताना और ख़ुदाबख्श और शंकर और मुख़्तार,


'धुआं' के मसऊद और कुलसूम,


'बू' के रणधीर और बेनाम घाटन लड़की,


'ठंडा गोश्त' के ईशर सिंह और कुलवंत कौर,


'खोल दो' की सकीना और सिराजुद्दीन,


'टोबा टेक सिंह'


और


'ऊपर, नीचे और दरम्यान' के मियां साहिब, बेगम साहिबा, मिस सिलढाना, डाक्टर जलाल, नौकर और नौकरानी-


इन सबका है। और इस सवाल का रुख उन अदालतों या इंसाफ़ की कुर्सी पर बैठे हुए उन इंसानों की तरफ़ नहीं, जिन्होंने मंटो को मुजरिमों के कटघरे मे खड़ा किया, बल्कि उन सामाजिक विद्वेषों की तरफ़ है जो सच के अस्तित्व से इनकार करने के आदी थे। यह सच मंटो की अपनी कल्पना की उपज न था। यह सच हमारे सामाजिक ढांचे की देन था। मंटो ने सिर्फ़ यह किया कि इस सच पर चढ़े हुए गिलाफ़ अपने क़लम की नोक से चाक कर दिए..."


इस 'दस्तावेज़' का पहला खंड समर्पित किया गया 'मोपासां के नाम सौ बरस पहले जिसके बस जिस्म को मौत आई थी।'


मोपासां भी दुनिया के बदनाम लेखकों में शुमार हैं।


मंटो ने खुद और अपने अफ़सानों के बारे में लिखा है, "ज़माने के जिस दौर से इस वक्त हम गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ़ हैं तो मेरे अफ़साने पढ़िए। अगर आप इन अफ़सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब यह है कि यह ज़माना नाक़ाबिले-बर्दाश्त है। मुझमें जो बुराइयां हैं, वो इस अहद की बुराइयां हैं। मेरी तहरीर में कोई नुक्स नहीं। जिस नुक्स को मेरे नाम से मंसूब किया जाता है, दरअस्ल मौजूदा निज़ाम का नुक़्स है-मैं हंगामापंसद नहीं। मैं लोगों के ख़्यालातो-जज़्बात में हेजान पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहजीबो-तमद्दुन की और सोसायटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए कि यह मेरा काम नहीं...लोग मुझे सियाह क़लम कहते हैं, लेकिन मैं तख़्ता-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफ़ेद चाक इस्तेमाल करता हूं कि तख़्ता-ए-सियाह की सियाही और ज़्यादा नुमायां हो जाए। यह मेरा खास अंदाज़, मेरा खास तर्ज़ है जिसे फ़हशनिगारी, तरक्कीपसंदी और ख़ुदा मालूम क्या-क्या कुछ कहा जाता है-लानत हो सआदत हसन मंटो पर, कमब़ख्त को गाली भी सलीक़े से नहीं दी जाती..."


अब इससे ज़्यादा एक लेखक और साफ़-साफ़ कह भी क्या सकता है! सौ बरस बीत बए जब मंटो साहब इस दुनिया में तशरीफ़ लाए थे। मक़बूल इंसान थे, बहुत जल्द ही ख़ुदा के प्यारे हो बए। महज़ 42 की उम्र में इस जहां को अलविदा कह दिया और सितारों में जा मिले। एक छोटी-सी ज़िंदगी...और इस दरम्यान अदीबों की महफ़िलों से लेकर अदालतों के कटघरे और पागलखाने तक में नमूदार हुए। ज़िंदगी भुगतनी पड़ती है मानो जेल हो, पर मंटो ने ज़िंदगी को भोगा, देखा तहों के भीतर तक जाकर और दिखाने की पुरज़ोर कोशिश भी की...वो कड़वी सच्चाइयां जिन्हें देखकर भी हम देखना नहीं चाहते, मुंह फेर लेते हैं, पर ज़िंदगी की कड़वाहट तो खत्म नहीं होती। अपने-अपने जल्वागाह हैं। मंटो कहते हैं ज़रा बाहर तो आइए जल्वागाहों से, देखिए हक़ीक़त। जहां वो रोशनी डालते हैं, आंखों में चुभती है, तो क्या बंद कर लें आंखें या आंखों के फोड़ लें या फिर क्या करें?


मंटो का साहित्य प्रासंगिक है, रहेगा। यह दुनिया रोज़ बनती है। जैसे रोटी। दुनिया बनती रहेगी, बदलती रहेगी। सियाही बढ़ेगी या कम होगी, कह पाना मुश्किल है। पर ज़िंदगी के लिए, एक मुकम्मल ज़िंदगी के लिए जंग शायद खत्म न हो, क्योंकि समय का पहिया थमता और रुकता नहीं। मंटो का साहित्य समय से मुठभेड़ के दौरान आयद हुआ। 'समय से मुठभेड़' के क्रम में ही शायर अदम गोंडवी साहब ने अपनी एक ग़ज़ल मरहूम मंटो को नज़र की है 'जिसके अफ़साने में ठंडे गोश्त की रूदाद है।' ये ठंडा गोश्त और गर्म गोश्त क्या है? तहज़ीबो-तमद्दुन क्या है? हज़ारों सालों के दौरान संस्कृति का सफ़रनामा क्या है? इन सवालों के जवाब तलाश करने पर मंटो के साहित्य में मिलते हैं।


मंटो की जन्मशताब्दी पर दैनिक भास्कर डॉट कॉम पेश करता है उनकी ज़िंदगी का सफ़रनामा, कुछ बेहद चर्चित और उन्हें बदनाम करने वाले अफ़साने और कुछ खास तस्वीरें। क्लिक कीजिए लिंक पर और देखिए मंटो की दुनिया, वही दुनिया जहां रोज़ ही तहज़ीबो-तमद्दुन की चोली उतारी जाती है।


लिंक: संक्षिप्त जीवन तथ्य (साभार- भारतकोश) (मंटो साहब का परिचय यहां भी पढ़ें )


अगली स्लाइड्स पर क्लिक करके देखिए मंटो की कुछ तस्वीरें...

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