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Home >> National >> In Depth >> A Special Comment On Anna By Pankaj Jha

टीम अन्ना : नौ दिन चले अढ़ाई कोस

पंकज झा | Aug 07, 2012, 10:09AM IST
 
 


महाराष्ट्र के विगत विधानसभा चुनाव के दिन थे। त्रयम्बकेश्वर से लेकर शनि सिग्नापुर तक के कुछ सौ किलोमीटर की यात्रा के दौरान चौक-चौराहों पर रुक-रुक कर लोगों से बात करता जा रहा था। साथ चल रहा स्थानीय चालक भी काफी जागरूक था और हर संवाद में बराबर की भागीदारी कर रहा था। हर जगह कांग्रेस के प्रति लगभग सामान आक्रोश। ताज हमले के भी ज्यादा दिन नहीं हुए थे। घटना के समय के सम्बंधित तीनों पाटिल (तात्कालीन गृह मंत्री आर आर पाटिल, केन्द्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल, और राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल) की भूमिकाओं को लेकर भी सामान आक्रोश था, किसानों की आत्महत्या, कमरतोड महंगाई, भ्रष्टाचार आदि की भी बातें जन-जन में आज की ही तरह तब भी था। लेकिन अपना मत व्यक्त करने वाले अधिकाँश लोगों में मोटे तौर राज ठाकरे के मनसे के प्रति समर्थन का भाव था। यह पूछने पर कि जिस कांग्रेस की आप इतनी लानत-मलानत कर रहे हैं, आखिर मनसे को वोट देने से वोटों के बंटवारे के कारण फिर उसी कांग्रेस गठबंधन की सरकार नही बन जायेगी? कोई भी इस बात पर ध्यान देने को तैयार नहीं था। वापसी तक यह बात पक्की हो गयी थी कि फिर से कांग्रेसनीत सरकार सत्ता में वापसी कर रही है।

 

टीम अन्ना द्वारा राजनीतिक दल बनाने की घोषणा के बाद अकस्मात वह सन्दर्भ याद आ गया. देश में भले अभी चुनाव न हो लेकिन कांग्रेस गठबंधन के विरुद्ध माहौल वैसा ही है। लेकिन घोषणा के अनुसार अगर टीम अन्ना ने अपनी पार्टी बना ली और वह थोडा-बहुत भी मतदाताओं का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में वह सफल हुई तो फिर महाराष्ट्र की वही कहानी दुहरा जाय तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। सवाल किसी के हार या जीत का नहीं है। सवाल यह है कि अगर ऐसा ही हुआ तो क्या टीम अन्ना के सोलह महीने के इस आंदोलन का, देश को उद्वेलित रखने का यह प्रयास क्या सफल माना जाएगा? जबाब नकारात्मक ही होगा।

 

सीधी सी बात है कि कांग्रेस हर समय एक सुविधाजनक स्थिति में इसलिए रहती है कि उसका एक तय मतदाता आधार है। आपातकाल के बाद हुए पहले चुनाव को अगर अपवाद मान लें, उस समय नसबंदी के कारण नाराज़ अल्पसंख्यकों के भी वोट नहीं देने के कारण कांग्रेस के शर्मनाक पराजय की बात छोड़ दी जाय तो यह कहा जा सकता है कि वह वोट आधार हमेशा कांग्रेस का रहा है. या कम से कम इतना तो ज़रूर रहा है कि उनका वोट उस उम्मीदवार के खाते में जाता है जो भाजपा को हरा सके जो अंततः कांगेस की सरकार बनाने में बाहर या भीतर से समर्थन कर सके. ऐसे में बस दो से तीन प्रतिशत कांग्रेस विरोधी वोटों का बंटवारा होने पर कांग्रेस आराम से सत्ता में आ जाती है। तो कांग्रेस के लिए निश्चय ही हर चुनाव में लड़ाई केवल इस दो या तीन प्रतिशत मतों को लेकर रहता है। या यूं कहें कि ऐसा दो या तीन प्रतिशत फ्लोटिंग वोट ही कांग्रेस का भविष्य तय करती आयी है। खैर।

 

इतना तय है कि अन्ना को समर्थन करने वाले लोग कम से कम केवल लोकपाल के लिए तो उनके साथ नहीं जुड़े थे। केवल किसी एक क़ानून को बनाने या उसका विरोध करने के लिए कोई इतना बड़ा आंदोलन खडा होता भी नहीं है। हां साधन के रूप में किसी एक बात से ही शुरुआत होती है लेकिन लक्ष्य उसके काफी बड़े हुआ करते हैं। मसलन गांधी ने चम्पारण में नील आंदोलन से शुरुआत की तो केवल उनका लक्ष्य वहां के किसान ही नहीं रहे होंगे। या जब उन्होंने नमक कानून को तोड़ने के लिए दांडी तक यात्रा की तब भी वह कानून तोडना भी केवल एक प्रतीक मात्र था। अंतिम लक्ष्य तो गुलामी से मुक्ति ही थी. जेपी का आंदोलन भी भले तात्कालिक तौर पर गुजरात के छात्रों के विषय को समर्थन देने से शुरू हुआ रहा हो लेकिन उस आंदोलन का भी अंतिम साध्य सम्पूर्ण क्रान्ति ही था। इसी तरह ‘मैं भी अन्ना तू भी अन्ना’ कह कर इस नए गांधी के प्रति उम्मीद भरी निगाहों से देखने वाले लाखों लोगों में से मुट्ठी भर को ही केवल पता रहा होगा कि लोकपाल किस चिड़िया का नाम है। बांकी तो सब इसी उम्मीद में टकटकी लगाए हुए थे कि उनके घर में आगे से इतना महँगा राशन नहीं आएगा. पटवारी को घूस नहीं देने पड़ेगा। अपने ही उपजाए अनाज को दस गुनी कीमत पर खरीदने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। सुबह कमाने निकला अपना बच्चा शाम को सही-सलामत घर वापस आ जाएगा आदि-आदि।

 

हालांकि यह बिलकुल सच है कि लोकतंत्र में कोई भी विकल्प तभी सही है जब वह राजनीतिक हो. इसके अभाव में कोई आंदोलन कितना खतरनाक हो सकता है, माओवाद इसका जीता जागता उदाहरण है। लेकिन यह भी तय है कि आंदोलन के बीच में से उठ कर आप रातों-रात नया राजनीतिक विकल्प खडा नहीं कर सकते या खुद ही राजनीतिक विकल्प बन भी नहीं सकते। एक सामाजिक आंदोलन को अंततः उपलब्ध विकल्पों में से सबसे अच्छे या कम बुरे विकल्पों का चयन करना पड़ता है। टीम अन्ना ने अगर इतिहास और पुराणों के उद्धरणों पर गौर किया होता तो दर्जनों ऐसे उदाहरण उन्हें मिल जाते। भगवान राम जब लंका की लड़ाई शुरू करने निकले थे तो सबसे पहले उन्होंने विभीषण के रूप में उपलब्ध विकल्प को अपनाया था। इससे पहले जब किष्किन्धा में उन्हें बालि से निपटना था तब भी उससे पहले ही उन्होंने सुग्रीव के रूप में एक राजनीतिक विकल्प तैयार रखा था। ऐसे ही चाणक्य जब नंद वंश का सफाया करने निकले तब भी उन्होंने चंद्रगुप्त को पहले तैयार किया। मोहनदास भी जब एक बड़े लक्ष्य को लेकर अफ्रीका से भारत आये तो पहले से उपलब्ध विकल्प ‘कांग्रेस’ को उन्होंने अपनाया और फिर गांधी बन जाने की राह उन्होंने तय की। जेपी जब सम्पूर्ण क्रान्ति करने निकले तब भी उन्होंने तब के तमाम कांग्रेस विरोधी तमाम कम बुरे दलों को साथ लेकर ही अपनी लड़ाई शुरू की। तो टीम अन्ना का न पहले वाला ‘आई हेट पोलिटिक्स’ वाला रवैया उचित था और न ही अभी का तमाम उपलब्ध विकल्पों को ठुकरा कर एक नए विकल्प पैदा करने की कवायद।

 

टीम अन्ना की यह हार हर उस आदमी के लिए पीड़ा दायक है जो समाज में सज्जन शक्ति को जीतते हुए देखना चाहती है। लेकिन निश्चय ही इस हार के लिए टीम अन्ना खुद ज्यादे जिम्मेदार है। अव्वल तो महज़ एक कानून की मांग ही गलत था। अभी भी देश में सक्षम कानुनों का अभाव नहीं है। अभाव है तो उसे लागू करने की मंशा रखने वाले ईमानदार लोगों का। अगर उसे लागू करने वाले लोग वही होंगे तब आप कुछ भी बना लीजिए उसका तोड़ निकल ही जाएगा। यह तय है कि कोई भी क़ानून लोगों को नैतिक बनाने की ताकत नहीं रखता। जिस सूचना के अधिकार को भी टीम अन्ना अपनी उपलब्धि बताती रही है, जो वाम के दबाव के कारण अंततः कानून बनना संभव हो पाया। उस कानून के अंतर्गत भी आज भी केन्द्र जो सूचना नहीं देना चाहता उसे छुपा ही लेता है। हाल ही में यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी से सम्बंधित सामान्य जानकारी तक इस कानून के माध्यम से सामने लाना संभव नहीं हुआ।

 

इसके उलट चुनाव से सम्बंधित बिना किसी नए कानून के भी टी एन शेषण और उनके उत्तराधिकारियों ने कितना कमाल किया है वह देश के सामने है। या कोई ईमानदार नेता, उपलब्ध कानूनों का इस्तेमाल करते हुए भी कितना कुछ कर सकता है इसका भी उदाहरण आपको समाज में दिख जाएगा। अगर लोकपाल की ही बात करें तो उत्तराखंड में बीजेपी ने बिलकुल अन्ना मॉडल पर ही वहां लोकपाल का गठन किया था। लेकिन लोकपाल बनाने वाले ही सत्ता से बेदखल होने से खुद को नहीं बचा पाए। हरियाणा में तो कांग्रेस के विरुद्ध प्रचार भी किया टीम अन्ना ने लेकिन उसका भी कोई परिणाम नहीं निकला।

 

इस बात से किसी को इनकार नहीं होगा कि निजी तौर पर अन्ना हजारे के सरोकारों पर किसी को कोई संदेह नहीं है। लेकिन यह भी तय है कि बिना किसी होमवर्क और पर्याप्त तैयारी के शुरू किये इस आंदोलन का यही हस्र होना था जो हुआ। जहां तक कांग्रेस का सवाल है तो एक सटीक नीति यह भी है कि अपने विरोधी खुद पैदा करो ताकि विरोध का मंच भी खुद के कब्ज़े में रहे। टीम अन्ना द्वारा राजनीतिक दल बनाने के घोषणा से जाने-अनजाने कांग्रेस को एक ऐसा ही ‘विरोधी पक्ष’ मिल गया है जो अंततः कांग्रेस के लिए ही मुफीद साबित होने वाला है।

 
 
 

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