राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेश पंत कहते हैं कि अफजल गुरु की फांसी से सरकार को कोई खास फायदा नहीं होगा। बल्कि जनता में यह संदेश अधिक जाएगा कि मूल मुद्दों पर विफल सरकार छटपटाहट में अपनी छवि सुधारने की हर संभव कोशिश कर रही है।
अफजल को फांसी दिया जाना एक साहसिक कदम है लेकिन इसका श्रेय गृहमंत्री से ज्यादा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को दिया जाना चाहिए जो प्रतिभा पाटिल की तरह फाइलों पर बैठने के बजाय त्वरित फैसले ले रहे हैं। जहां तक गृहमंत्री का सवाल है तो उनका कोई भी बयान विश्वसनीय नहीं है। वह भाजपा और आरएसएस को आतंक के ट्रैनिंग कैंपों से तो जोड़ते हैं लेकिन कोई ठोस कार्रवाई करने के बजाय अपने ही बयान से पलट जाते हैं। कसाब की फांसी के बाद जब उनसे अफजल गुरु के बारे में पूछा गया था तब उन्होंने कहा था कि अभी फाइल उनके पास नहीं पहुंची है।
सरकार इस समय इतना फंसी हुई है कि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। महंगाई बढ़ रही है, वित्तीय घाटा 20 प्रतिशत तक पहुंच गया है। सरकार बलात्कार को रोकने में असमर्थ है, ऐसे में ठंडे बस्ते में पड़ी चीजों को निकालकर छवि बदलने की कोशिश की जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारों और राजीव गांधी के हत्यारों को कब फांसी होगी? सरकार की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जनता की नजर में यह अब एक लचरसरकार है। जब यह कुछ अच्छा करने की कोई कोशिश भी करेगी तो उसे बस दिखावा ही समझा जाएगा।
दूसरा पहलू यह भी है कि मोदी के पक्ष में बन रहे मोमेंटम से सरकार घबराई हुई है। ऐसे में अफजल को फांसी पर लटका कर सरकार ने निश्चित रूप से जरूरी काम किया है लेकिन इससे भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर कोई असर पड़ेगा यह कहना इसलिए बेमानी होगा क्योंकि भारत में पाक प्रायोजित आतंकवाद ही है लेकिन पाक सरकार हमेशा इसे नकारती रही है। हमारी सरकार की दिक्कत यह है कि यह भारत के अल्पसंख्यकों को पाकिस्तान से जोड़ती है। जो कहीं न कहीं अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की राजनीति के कारण भी है।
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