नरीमन ने कहा कि अफजल को 9 फरवरी को फांसी देने के फैसले के बारे में उसके परिवार को जेल नियमों के अनुसार, स्पीड पोस्ट से जानकारी दे दी गई थी लेकिन अधिकारियों को टेलीफोन कर सूचना देने पर कोई रोक नहीं थी। जाने-माने कानून विशेषज्ञ ने कहा कि टेलीफोन से जानकारी देना इसलिए जरूरी नहीं समझा गया कि सरकार के कुछ लोगों ने सोचा होगा कि अफजल गुरु को मौत की सजा के खिलाफ अदालत से रोक का आदेश मिल जाएगा।
जब उन्हें बताया गया कि सरकार के मुताबिक, वह जेल नियमों से बंधी है जिसमें जानकारी पत्र से देने की शर्त है तो नरीमन ने कहा, ‘इसका कड़ाई से पालन किया जाए। पत्र भेजा जाए लेकिन इससे आपके फोन करने पर रोक नहीं है। जेल मैनुअल में यह नहीं लिखा कि आप फोन से जानकारी नहीं दे सकते।’
नरीमन ने कहा कि परिवार को फोन के जरिए सूचना दी जानी चाहिए थी और जेल मैनअुल के बचकाने बहाने नहीं दिए जाने चाहिए जो अफजल के मामले में पूरी तरह लापरवाही वाला रहा। अफजल के शव को उसके परिवार के सुपुर्द करने की बात पर नरीमन ने कहा कि अगर वाकई इस बात का अंदेशा था कि इसका इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन के लिए किया जा सकता है तो जेल मैनुअल के अनुसार शव को नहीं देना न्यायोचित हो सकता है। उन्होंने कहा, मुझे सही बात नहीं पता। अगर दूसरी बात ठीक है तो हां इसे रखना सही था। मुझे लगता है कि अगर कोई आशंका थी तो इसका बड़े प्रदर्शन में इस्तेमाल हो सकता है और अगर सरकार वाकई आशंकित थी तो शायद वे जेल मैनुअल का पालन करते हुए सही रहे होंगे।’
क्या भारत सरकार ने फांसी दिए जाने वाले शख्स की उसकी पत्नी और बेटे से आखिरी मुलाकात करने देने की उम्मीद के न्यूनतम मानक को पूरा नहीं कर के अपनी छवि को कमतर किया है। इस सवाल पर नरीमन ने ‘हां’ में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि गृहमंत्री को इस कार्रवाई के लिए सीधे कार्रवाई के लिए सीधे नहीं लेकिन परोक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है क्योंकि यह पूरी तरह संवेदनाहीन था।
नरीमन ने कहा, ‘उन्होंने शुरुआती तैयारी नहीं की। जैसे कि कई अन्य चीजों में वे शुरुआती काम नहीं करते। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। पूरी प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ खामी है।’ उन्होंने कहा कि जिस तरह से अफजल को फांसी दी गई, उससे भारत शर्मसार हुआ है। उन्होंने क हा कि अगर वह सरकार में होते तो बहुत शर्मिंदा होते। जब उनसे पूछा गया कि क्या मौत की सजा को समाप्त करने का समय आ गया है तो उन्होंने कहा, ‘न्यायाधीश इस पर सहमत नहीं होते, लोग इस पर रजामंद नहीं होते, राष्ट्रपति इस पर सहमत नहीं होते। यह बहुत दुविधा की स्थिति है।’
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