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अपना-अपना हाजमा

 
Source: डॉ भारत अग्रवाल   |   Last Updated 10:11(31/12/11)
 
 
 
 
अपना-अपना हाजमा

अन्ना हजारे वो शै हैं,जिसे नेता न निगल पा रहे हैं और न उगल पा रहे हैं। नेता ऊपर से अन्ना के लिए भालो-बाशी बने रहें,लेकिन बस चले तो अन्ना पर मीसा-कोफेपोसा-टाडा, जो मर्जी लगा दें। कांग्रेसी तो अन्ना पर उबले जा रहे हैं, हालांकि सबके सामने दिल की भावनाएं पचाए रखने की बड़ी भारी ताकत है। लालू-मुलायम को छोड़िए, सीपीएम के गुरुदास दासगुप्ता अन्ना को तालिबान कह चुके हैं।

हालांकि सीपीआई के नेता जंतर-मंतर पर अन्ना की बुलाई बहस में शामिल हुए थे। संसद में दासगुप्ता ने फिर अन्ना के खिलाफ कुछ कहा, और बात प्रणबदा के हाजमे पर आ गई। प्रणबदा ने पूछ ही लिया- ‘फिर लेफ्ट के नेता जंतर-मंतर पर क्यों गए थे?’ दासगुप्ता क्या जवाब देते, अपना-अपना हाजमा है।

हम भी हैं टीम में

और जब हालत न निगल पाने की हो और न उगल पाने की, तो क्या होता है? एक बानगी देखिए। कार्मिक राज्यमंत्री वी. नारायणसामी लोकसभा में लोकपाल विधेयक पेश करने उठे। सबको सांप सूंघ गया। लालू-मुलायम ने तुरंत अल्पसंख्यक कोटे की अड़चन पेश की और सदन सफलतापूर्वक कई बार स्थगित हुआ। लेकिन दोपहर तक अल्पसंख्यक शब्द जोड़ने का फैसला हो गया। अब क्या करें? पेट्रोलियम राज्यमंत्री आरपीएन सिंह ने मजाक में नारायणसामी से कहा- ‘बिल पेश कीजिए, इतिहास बनाइए.. और सारे सांसदों को जेल भिजवा दीजिए।’


हॉर्न प्लीज!


बेचैनी कीइस हालत में कदम और जुबान खूब बहक रहे हैं। काले धन के मसले पर लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा में कामरोको प्रस्ताव रखा। पूरे दिन बहस के बाद बात आई प्रस्ताव मंजूर-नामंजूर करने की। भाजपा को पता था, बहुमत कांग्रेस का है और मत-विभाजन का कोई फायदा नहीं है। लेकिन हद तो तब हो गई, जब ध्वनिमत के दौरान सत्ता पक्ष वाले भी गलतफहमी में पहले ‘हां’ कह गए और फिर गलती सुधारते हुए ‘ना’ बोले। फुल टेंशन था।

गले में गीता


यह मत सोचिए कि लालू-मुलायम सिर्फ अन्ना के हल्ले से डरे हुए हैं। उन्हें पता नहीं किस-किस चीज का डर है। साइबेरिया की अदालत में गीता पर प्रतिबंध लगाने संबंधी मुकदमे पर उन्होंने संसद में जी-भरकर हंगामा किया। भाजपा शांत थी, या हंगामे से थक चुकी थी। सुषमा स्वराज अपने कक्ष में पत्रकारों से बात कर रही थीं और लालू-मुलायम का हंगामा टीवी पर देख रही थीं। गीता उनके गले में लटके पेंडेंट पर उकेरी हुई है। इसे उनके पति ने शादी की पिछली सालगिरह पर भेंट किया था। इसे सिर्फ खुर्दबीन से पढ़ा जा सकता है।


इन-हाउस फैसिलिटी


अजित सिंह नागरिक उड्डयन मंत्री हैं। लेकिन उनका असली महकमा पाला बदलने का माना जाता है। अब मंत्री होने के नाते वह सरकारी बेंच पर बैठते हैं, लेकिन अगर लोकसभा में मत-विभाजन हो तो वोट डालने उन्हें फिर विपक्ष में अपनी पुरानी कुर्सी पर जाना पड़ता है। कहा ये जा रहा है कि इससे पाला बदलने की फितरत भी संतुष्ट होती रहती है और सरकार भी चलती रहती है।


मौन सभा


हाल ही में लोकसभा के पहले स्पीकर जी.वी. मावलंकर की १२३वीं जयंती के अवसर पर सांसदों को सेंट्रल हॉल में श्रद्धांजलि के लिए मौजूद रहने की खबर दी गई थी, लेकिन श्रद्धांजलि देने पहुंचे सिर्फ लालकृष्ण आडवाणी। एक भी सांसद-पदाधिकारी नहीं। सिर्फ दोनों सदनों के महासचिव श्रद्धांजलि दे रहे थे। हैरान आडवाणी अब यह सुझाव देने जा रहे हैं कि ऐसा नियम बनाया जाए कि स्पीकर की गैर-मौजूदगी में कम से कम संसदीय पैनल के अध्यक्ष तो मौजूद रहें।


आड़े वक्त की तैयारी


सचमुच इतना बुरा हाल तो यूपी की कैबिनेट तक का नहीं है। वैसे यूपी की माया कैबिनेट अपनी मीटिंगों में जरा भी समय खर्च करने में विश्वास नहीं करती है। मीटिंग बुलाई, माया मेमसाब के फैसले सुने, ‘जी, भैनजी’ कहा और चार-छह मिनट में मीटिंग खत्म। अब यूपी में कैबिनेट फैसले टाइप की फालतू चीजों पर दिमाग कौन खर्च करे? कुछ तो आड़े वक्त के लिए भी बचाकर रखना पड़ता है।


मौलिक अधिकार


बुजुर्ग पुरुषों में प्रोस्टेट की बीमारी आम है। इसका इलाज सस्ता व आसान है और देश के हर इलाके में हो जाता है। ऑपरेशन के बाद एक-दो दिन का आराम भी अमूमन बहुत होता है। लेकिन अगर मरीज की हैसियत एनएचआरसी के अध्यक्ष की हो, तो ऑपरेशन के लिए अमेरिका जाना होता है, देखभाल के लिए पत्नी और सचिव को ले जाना पड़ता है और आराम कई-कई हफ्तों तक चलता है। रूल कहता है- ऐसा इलाज कराना हर मानव का मौलिक अधिकार है, बशर्ते वह किसी आयोग का अध्यक्ष हो।


ये क्या हो रहा है?


सरसंघचालक मोहन भागवत ने पिछले दिनों संघ से जुड़े पत्रकारों की एक बैठक झंडेवालान में बुलाई। जो असली संघी पत्रकार हैं, उनमें से तो कई इस डर से नहीं पहुंचे कि अगले ही दिन से आईबी वाले उनकी नौकरी के पीछे पड़ जाएंगे। लेकिन कुछ गैर संघी पत्रकार जरूर पहुंच गए। खूब सज-संवरकर, लंबी-लंबी गाड़ियों में। संघ में ये क्या हो रहा है?


किसी से न कहना

दिल्ली का इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा। एक फ्लाइट विदेश से आई। तमाम लोग उतरे। केंद्र में मंत्री रह चुके और वर्तमान में कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी को प्रवर्तन निदेशालय वालों ने थाम लिया। काफी सख्ती और किरकिरी हुई। सीधे मंत्री से फोन करवाए, तब कहीं जाकर जान छूटी। जिसे भी पता है, उससे कहा जा रहा है- किसी से न कहना।


मंत्रालय वाले भी

लौह अयस्क निर्यात में घालमेल करने वालों में वाणिज्य-उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत एक कंपनी फंसती नजर आ रही है। कंपनी का नाम है पीईसी। ये कंपनी बेल्लारी के रेड्डियों की आंच में तप रही है। खुफिया निगाहें जम चुकी हैं। आगे देखते हैं, क्या होता है?
 
 
 
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