सेना प्रमुख आयु विवाद: कोर्ट से बाहर हल होने की उम्मीद नहीं
Source: हेमंत अत्री | Last Updated 10:14(08/02/12)
नई दिल्ली। थल सेना प्रमुख जनरल विजय कुमार सिंह के आयु विवाद के अदालत से बाहर हल होने की संभावनाएं क्षीण हो जाने के बाद अब इस बहुचर्चित विवाद का निपटारा सुप्रीम कोर्ट में ही होगा। रक्षा मंत्रालय उनकी जन्म तिथि 10 मई 1950 मानने के अपने रुख पर कायम है। उसने प्रधानमंत्री कार्यालय को इससे अवगत करा दिया है। मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार 10 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में होनी है।
मंत्रालय के शीर्ष पदस्थ अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, तीन फरवरी को मामले की आरंभिक सुनवाई में कोर्ट का रुख देखने के बाद अटार्नी जनरल व सॉलिसिटर जनरल के साथ मंत्रालय के आला अधिकारियों की दो दौर की बैठकों के बाद तय किया गया है कि जन्मतिथि को लेकर मंत्रालय अपने रुख पर कायम रहेगा।
लेकिन, जनरल वीके सिंह की वैधानिक शिकायत को खारिज करने वाले मंत्रालय के 30 दिसंबर के आदेश पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया गया है। संकेत मिले हैं कि पत्र वापस लेने पर कोई भी फैसला सुनवाई के दौरान खंडपीठ का रुख देखकर मौके पर ही तय किया जाएगा।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार के दोनों शीर्ष कानून अधिकारियों ने मंत्रालय के अधिकारियों को भरोसा दिलाया है कि मामले में मंत्रालय के रुख को सही साबित करने के पर्याप्त आधार हैं और उन्हें कदम पीछे हटाने की जरूरत नहीं है।
अगली सुनवाई के दौरान दोनों कानूनी अधिकारी मामले की सुनवाई मैरिट के आधार पर किए जाने पर ही जोर देंगे। रक्षा मंत्रालय की इस बारे में प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों से भी बातचीत हुई है। यही वजह है कि शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में आरंभिक सुनवाई के बाद मामले को अदालत से बाहर निपटाने के लिए कोई सक्रिय प्रयास नहीं किए गए।
रक्षा मंत्री भी मामले में कानूनी अधिकारियों की राय से सहमत बताए जा रहे हैं। यही कारण है कि वे तीन फरवरी की सुनवाई के बाद प्रधानमंत्री से मिले और हालात पर चर्चा करके कोच्चि चले गए।
एंटनी फिलहाल विशाखापट्नम में नौसेना की सामरिक ताकत का आकलन कर रहे हैं और बुधवार शाम तक दिल्ली लौटेंगे। ऐसे में मामले को अदालत से बाहर निपटाने के लिए आने वाले एकाध दिन में सरकार की ओर से किसी पहली की गुंजाइश काफी कम है।
ऐसे में देश के इतिहास में सेना प्रमुख द्वारा रक्षा मंत्रालय के फैसले को चुनौती देने के अपनी तरह के इस पहले मामले का पटाक्षेप अब कानूनी तर्क-वितर्क के ही जरिए होना निश्चित है।