आडवाणी जी के रूम में बंद कर दिया गया था हमें: अरुण जेटली
dainikbhaskar
| Feb 10, 2013, 15:15PM IST

नई दिल्ली. संसद पर हमले की यादें आज भी कई नेताओं के जेहन में ताज़ा हैं। हमले के दौरान संसद के भीतर मौजूद रहे बीजेपी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली और पूर्व केंद्रीय मंत्री एडवर्ड ने उस दिन का अनुभव पाठकों के साथ साझा किया है।
आडवाणी जी के रूम में बंद कर दिया गया था हमें: अरुण जेटली
संसद पर आतंकी हमले की याद आज भी ताजा है। 13 दिसंबर 2001 की सुबह सब कुछ सामान्य था। सदन में प्रश्नकाल चल रहा था। मैं और वेंकैया नायडू तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी के साथ उनके कक्ष में बैठे थे। उस समय राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष मनमोहन सिंह थे। उनका कक्ष ठीक बगल में था। हमारे बीच बातचीत चल रही थी तभी बाहर पटाखे चलने की-सी आवाज सुनाई पड़ी। फौरन आडवाणी जी ने दिल्ली पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर अजाय राज शर्मा से फोन पर बात की। कमिश्नर ने बताया कि संसद पर आतंकी हमला हो गया है और वह संसद ही पहुंच रहे हैं। इस बीच मनमोहन सिंह भी आडवाणी के कक्ष में पहुंच गए। कुछ समय के बाद सुरक्षा में तैनात जवानों ने आडवाणी के कक्ष को बंद कर दिया। हम सभी वहीं लगभग 20 मिनट तक बैठे रहे। इसी बीच मनमोहन सिंह और आडवाणी ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बारे में पता लगाया। संयोग से दोनों ही उस दिन संसद नहीं आए थे।
लगभग 40 मिनट बाद यह सूचना मिली की सभी आतंकी मारे गए हैं और वह संसद भवन के अंदर नहीं घुस सके थे। लगभग डेढ़ घंटे के बाद आडवाणी, वैंकेया नायडू, मनमोहन सिंह और मुझे सुरक्षाकर्मी कक्ष से बाहर संसद भवन परिसर में ले गए। हमने बाहर का माहौल देखा। अंदाजा लगा कि हमला कितना खतरनाक था। लोकसभा के उपाध्यक्ष आजकल जिस गेट से बाहर निकलते हैं वहां एक साथ तीन आतंकियों के शव पड़े थे। इन तीनों को एक ही कांस्टेबल ने मार गिराया था। उस कांस्टेबल का नाम इस वक्त याद नहीं आ रहा है लेकिन उससे हमने बात की। वह एक पेड़ की ओट से निशाना साध रहा था। दूसरे गेट पर भी एक आतंकी मरा पड़ा था। हमला भयानक था लेकिन हमारे सुरक्षाकर्मियों ने उस हमले को नाकाम कर दिया।
सीढ़ियों से उतरे तो जान बची, फिर लिफ्ट से कर ली तौबा : एडवर्ड
उस दिन रोज की तरह समय पर मैं अपने आवास से संसद पहुंचने के लिए निकला। मेरा ड्राइवर दिल्ली के मेरे सरकारी निवास 701, स्वर्ण जयंती अपार्टमेंट के नीचे इंतजार कर रहा था। लेकिन उस दिन लिफ्ट ने मेरे प्लोर पर आने में जरा देर कर दी। उकताकर मैंने तय किया कि सीढिय़ों से ही चला जाए। तो मैंने सातवीं मंजिल से सीढिय़ों के रास्ते उतरना शुरू कर दिया। नीचे आने तक करीब ढाई से तीन मिनट लगे होंगे। खैर, मेरी गाड़ी संसद के लिए निकली। करीब दो से तीन मिनट में हम संसद के मुख्य द्वार पर पहुंचे तो मेरे सामने ही सुरक्षाकर्मियों ने धड़ाधड़ गेट बंद करने शुरू कर दिए। हमसे कहा कि संसद पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया है, वापस लौट जाएं। मैंने ड्राइवर से गाड़ी वापस ले चलने के लिए कहा और हम स्वर्ण जयंती अपार्टमेंट पर अपने आवास में सुरक्षित पहुंच गए। मैंने सोचा कि अगर हर दिन की तरह उस दिन भी मैंने सीढिय़ों से नीचे उतरने की बजाय लिफ्ट ली होती तो क्या होता। मैं ठीक उसी वक्त संसद के खुले परिसर में होता जब वहां गोलियां चल रही थीं। मुझे लगा कि सीढिय़ों ने मेरी जान बचाई है। उसी दिन से मैंने तय कर लिया कि अब लिफ्ट को तौबा! उस दिन से जब तक उस अपार्टमेंट में रहा, सातवीं मंजिल के अपने घर से सीढ़ियों से ही उतरा। (एडवर्ड फैलेरियो पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं...)








