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केजरीवाल ने सोनिया गांधी के दामाद पर लगाए गंभीर आरोप

Dainikbhaskar.com | Oct 05, 2012, 17:02PM IST
 
 



1990 के दशक के शुरुआती दौर में जब तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन के चहुंओर चर्चे थे, साउथ मुंबई में रोटरी क्लब की एक मीटिंग में किसी ने उनसे पूछा कि वह चुनाव में खड़े क्यों नहीं होते। शेषन ने तपाक से कहा- ‘मैं खड़ा हो जाऊंगा, लेकिन आपमें से कितने लोग मेरा समर्थन करेंगे?’ सभी ने हाथ ऊपर कर दिया। इस पद से रिटायर होने के बाद शेषन ने वर्ष 1997 में शिवसेना समर्थित प्रत्याशी के तौर पर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा, लेकिन बुरी तरह पराजित हुए। 1999 में वह गांधीनगर लोकसभा सीट से कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार के तौर पर लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ मैदान में थे, लेकिन यहां भी उन्हें मात मिली। 
 
 
शेषन राजनीति में आने की नाकाम कोशिश करने वाले कोई पहले और आखिरी मध्यमवर्गीय ‘धर्मयोद्धा’ नहीं थे। इस अखाड़े में अपनी टोपी (या कहें कि गांधी टोपी) के साथ उतरने वाले नए शख्स जनलोकपाल के झंडाबरदार अरविंद केजरीवाल हैं। शेषन और केजरीवाल दोनों ही नौकरशाह रहे, जिन्होंने आगे चलकर अपनी-अपनी भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम के जरिये जनता का ध्यान खींचा। जहां शेषन चुनावों में धनबल और बाहुबल के खिलाफ जनता के बढ़ते गुस्से का प्रतीक बने, वहीं केजरीवाल ने शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार के खिलाफ उपजे ऐसे ही जनाक्रोश का प्रतिनिधित्व किया। सवाल यह है कि क्या केजरीवाल इस नई मुहिम में सफल होंगे, जहां उनसे पहले कई लोग नाकाम हो चुके हैं?
 
 
यदि कामयाबी व नाकामी को चुनावी प्रदर्शन के आधार पर आंका जाए तो कुछ ही लोग इस पूर्व आईआरएस अफसर और उनकी टीम से उम्मीद करेंगे। देश का पार्टी तंत्र कुछ ऐसा है, जिसमें किसी नवागंतुक के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती। चुनावों में धनबल का जबर्दस्त प्रभाव एक स्थायी परिघटना है। इसके अलावा जाति, समुदाय और स्थानीय नेटवर्क जैसे घटक भी चुनावी नतीजों के लिहाज से काफी अहम हैं। मध्यमवर्गीय नायकों का भले ही टीवी स्टूडियो में जमकर स्वागत हो, लेकिन यह सराहना हमेशा मतों के रूप में तब्दील नहीं होती। और जैसा मायावती ने बार-बार दर्शाया कि यदि आपके पक्ष में बहुजन समाज पार्टी जैसी मशीन है तो आपको मीडिया की भी जरूरत नहीं है। 
 
 
 
इसके उलट टीम अन्ना इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा बनाई गई। काफी हद तक अन्ना हजारे का व्यक्तित्व ही इसका मुख्य आकर्षण था। एक फकीर जैसी शख्सियत उन लोगों के लिए चुंबक बन गई, जो पारंपरिक राजनेताओं की दागदार छवि से बिल्कुल उलट एक नई ‘बेदाग’ छवि को शिद्दत से तलाश रहे थे। लेकिन अन्ना दिल से एक कार्यकर्ता थे, जिन्हें कैमरे तो रास आए, लेकिन वे कभी भी राष्ट्रीय राजनीति की हलचलों या जीवंत परिचर्चाओं के साथ सहज नहीं रहे। वहीं केजरीवाल एक जल्दबाज मनुष्य हैं, जो बदलाव के लिए बेताब हैं और उनकी ख्वाहिश है कि उन्हें बदलाव के कारक के तौर पर देखा जाए। 
 
 
इसलिए जब तक बदलाव का आह्वान सिर्फ सख्त भ्रष्टाचार-विरोधी कानून लाने के एकसूत्री एजेंडे तक सीमित रहा, मध्यवर्ग ने इसे खूब समर्थन दिया। लेकिन टीम अरविंद का लक्ष्य इससे कहीं ज्यादा बड़ा है, जो उनके नीतिपत्र से जाहिर होता है। इसमें राजनीति में व्यापक बदलाव लाने, जनता का राज कायम करने, वीआईपी संस्कृति को खत्म करने और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने की बात कही गई है। आखिर कौन ऐसी पार्टी नहीं चाहेगा, जो लाल बत्ती संस्कृति को नकारती हो या कैंपेन फंडिंग को पारदर्शी बनाने पर जोर देती हो? इस दस्तावेज को पढ़कर लगता है मानो आपको सदाचारी राजनीति के ऐसे आदर्शवादी दौर में पहुंचाया जा रहा है, जहां हमारे दौर के खलनायकों के लिए कोई जगह नहीं है। 
 
 
लेकिन राजनीतिक पार्टियां ‘सब नेता चोर हैं’ जैसी लोकलुभावन बातों के दम पर नहीं बनाई जा सकतीं। व्यवस्था विरोधी हीरो फिल्मों में चल सकते हैं, क्योंकि दर्शक इसे एक तीन घंटे के पलायनवादी रोमांच की तरह देखते हैं, जिसमें आपको अपना कुछ नहीं देना पड़ता। लेकिन असल जिंदगी की बात करें तो टीम अरविंद का विजन राजनीति को एक ‘धर्मयुद्ध’ या नैतिकता की जंग की तरह देखता है। क्या देश का मध्यम वर्ग किसी ऐसी लड़ाई के लिए तैयार है, जो मोमबत्ती रैलियों और मेड फॉर टीवी अनशनों से परे जाती हो? क्या उनकी उपभोक्तावादी जीवनशैली उन्हें ऐसी पार्टी के साथ जुड़ने देगी, जो आर्थिक उदारीकरण पर सवाल उठाती हो और वंचित वर्गो के लिए आरक्षण चाहती हो? व्यापक राजनीतिक भूमिका की तलाश में टीम अरविंद उस मुख्य मतदाता वर्ग को दूर करने का जोखिम उठा रही है, जिसने उनका मूल आंदोलन खड़ा किया था। 
 
 
इसके अलावा मुख्य सवाल अभी बाकी है। आप चयनित निकायों में अपने प्रतिनिधियों को भेजे बगैर राजनीति को किस तरह बदल सकते हैं? सिस्टम महज बाहर से हल्के स्पर्श से नहीं बदलेगा, इसे ऊपर से नीचे तक पूरी तरह हिलाना होगा। यदि सत्ता महज कांग्रेस से भाजपा के या लेफ्ट से ममता के अथवा मायावती से मुलायम के हाथों में जाती रही, तो ऐसा होगा भी नहीं। ये तो अंदरूनी तख्तापलट हैं, कोई क्रांति नहीं जिसकी टीम अरविंद को तलाश है। 
टीम अरविंद को राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता पाने के व्यापक लक्ष्य की बजाय अगले साल होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनाव से अपनी शुरुआत करनी चाहिए। उन्हें सीटें जीतने के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है, लेकिन बिजली दरों में बढ़ोतरी, महिलाओं की सुरक्षा या रीयल एस्टेट में पसरे भ्रष्टाचार जैसे स्थानीय मुद्दे उठाते हुए वे कम से कम शहरी राजनीतिक एजेंडे को प्रभावित करने की उम्मीद तो कर सकते हैं। 
 
 
पुनश्च : टीम अरविंद ने गांधी जयंती (2 अक्टूबर) के मौके पर अपनी पार्टी लांच की। विजुअल इमेज के इस दौर में राजनीतिक प्रतीकात्मकता भले ही अहम हो, लेकिन क्या गांधी टोपी पहनने जैसे कर्मकांडों की वाकई जरूरत है? यदि टीम अरविंद वास्तव में अलग तरह की राजनीति करना चाहती है, तो उसे प्रतीकों व बयानबाजियों से आगे निकलना होगा।
 
(लेखक आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं)


 

 
 
 

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