बड़ा वाला राजनैतिक सुधार- एपी-बीपी युग

बात शुरू करते हैं रिटेल में एफडीआई के मुद्दे से। इसे "बड़ा वाला उर्फ बिग टिकट आर्थिक सुधार" कहा जाता है, जिसके गुरु प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। कहते हैं कि मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही दो-तीन बड़े वाले आर्थिक सुधार कर डालना चाहते थे। फिर अब जाकर क्यों, पहले क्यों नहीं? राजनीति के गलियारों में जो जवाब चल रहा है, उसके
मुताबिक पहले "बीपी युग" था, अब "एपी युग" है। "बीपी" माने बिफोर प्रणब और "एपी" माने आफ्टर प्रणब। तो क्या बड़े वाले आर्थिक सुधारों के लायक बड़ा वाला राजनैतिक मैनेजमेंट अब जाकर मुकम्मल हुआ है?
जेठमलानी की धमक!
बात ज्यादा ही गहरी हो गई ना? छोड़िए, एक हल्की~फुल्की बात बताते हैं। राम जेठमलानी को भाजपा ने नोटिस दे दिया। जेठमलानी ने जवाब में चिट्ठी जो लिखी, सो लिखी, यह भी कहा कि नोटिस में दम न हुआ तो फाड़कर फेंक दूंगा। जवाब में भाजपा वालों ने कहा कि हम जेठमलानी की चिट्ठी को कूड़े में फेंक देंगे।
बयान बहादुरी अपनी जगह है, लेकिन असली बात ये है कि इसी भाजपा ने किताब में जिन्ना की तारीफ करने पर जसवंत सिंह को उस राष्ट्रीय कार्यकारिणी मीटिंग के दौरान निकाल दिया था, जिस मीटिंग के लिए वह खुद भी पहुंचे थे। जसवंत पर बहादुरी और जेठमलानी को नोटिस क्यों? जवाब है, जेठमलानी खुर्राट वकील हैं और जसवंत सिंह नहीं हैं। वह पार्टी को ही कोर्ट में खड़ा कर देते तो?
पिता बड़ा या नेता?
जो भी शरद यादव को जानता है, वह यह भी जानता है कि उन्हें एक साथ कई काम और वो भी पूरी एकाग्रता से करने में कभी कोई समस्या नहीं होती। हाल ही में उनकी बिटिया सुहासिनी का विवाह हुआ। उन्हीं दिनों एफडीआई का फच्चर फंसा हुआ था। शरद एक तरफ बेटी के पिता, तो दूसरी ओर एनडीए के संयोजक भी थे। वे दोनों जिमेदारियां बखूबी संभालते रहे। सिर्फ एक मौके पर जाकर जिम्मेदारियों में टकराव हुआ।
शरद सर्वदलीय मीटिंग में थे और घर से कॉल आ गया। उन्हें फौरन घर भागना पड़ा। और जानने वाले कहते हैं कि शरद के मामले में शायद पहली बार लगा कि पिता कीजिम्मेदारी एक राजनेता की हैसियत से बड़ी होती है।
फुर्सत में हैं प्रणबदा
सचमुच राजनीति की जिमेदारियों से वक्त निकाल लेना राजनेताओं के लिए
किसी सपनों की दुनिया से कम नहीं होता। प्रणब मुखर्जी ने राजनीति में रहते
हुए सिर्फ एक फिल्म देखी थी ‘रंग दे बसंती’, वह भी सरकारी मजबूरी में।
उस समय वे रक्षा मंत्री थे। आजकल राष्ट्रपति भवन के ऑडिटोरियम में वे फिल्में देख लेते हैं। किताबें पढ़ने का भी समय निकाल लेते हैं और तमाम तरह के संगीतज्ञों को भी राष्ट्रपति भवन से निमंत्रण मिलता रहता है। उनके कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए भी तमाम बड़े लोगों को राष्ट्रपति भवन से निमंत्रण मिलता रहता है। इसे कहते हैं राजनीति के फुर्सत।
..तेरा वचन न जाए खाली
जीव-जंतुओं के लिए ममता दीदी का प्रेम किसी से छिपा नहीं है। हाल ही में उनके एक कार्यक्रम में एक लंगूर कहीं से घुस आया। ममता बनर्जी का भाषण शुरू हुआ और वह आकर मंच के बिल्कुल पास बैठ गया। ममता दीदी ने उसकी तरफ देखा, चंडी पाठ के कुछ मंत्र पढ़े, मुस्कुराईं, लोगों से शांत रहने को कहा और अपना भाषण जारी रखा। मंत्रों का असर हुआ और वह वानर वहां से शांति से चला भी गया। न किसी पुलिस वाले ने दौड़ाया, न किसी कार्यकर्ता ने। बाद में एक पुलिस वाले का कहना था कि वैसे भी वानर न तो काटरून बनाते हैं और न फेसबुक लॉग इन करते हैं, तो हम भला उसके पीछे क्यों पड़ते! उसके लिए तो मंत्र ही काफी था।
थ्रीडी आफत
गडकरी मौनव्रत पर हैं, उधर नरेंद्र मोदी जमकर पटाखे चला रहे हैं। उनका
कहना है कि चुनाव परिणाम आने के बाद गुजरात फिर दिवाली मनाएगा।
मोदी ने तीन डायमेंशन्स (थ्रीडी) वाला प्रचार छेड़ दिया है। मोदी एक
जगह भाषण देते हैं, दिखाईसुनाई कई जगह देते हैं। लेकिन भाजपा के
एक बड़े नेता का कहना है कि पार्टी की मुसीबतें भी आजकल थ्रीडी हो गई
हैं। हमले कई तरफ से होते हैं, दिखाईसुनाई कोई नहीं देता है।
राम सहारे युद्ध!
पॉलिटिक्स का एक और
पार्ट सुन लीजिए। भनक
ये है कि गडकरी से दोदो
हाथ करने वाले जेठमलानी
को भी कहीं से शह है।
हरियाणा के कांग्रेस नेता
विनोद शर्मा और लालू प्रसाद यादव से तो उनका परिचय वकालत के नाते ही हो गया था। कुछ और भी सरकारी अफसर व कांग्रेस नेता उनके संपर्क में बने हुए हैं।
शोक का बाजार
बाजार के इस युग में शोक का भी बाजार होता है। बाल ठाकरे के देहांत के दिन मुंबई में लाखों की भीड़ उन्हें श्रद्धांजलि देने उमड़ पड़ी थी। मृत्यु की खबर मिलते ही मुंबई भर के बाजार भी तुरंत बंद हो गए थे। बाकी बातों के अलावा इससे फूलों की दुकानें भी बंद हो गई थीं, और आम लोगों की तो बात ही छोड़िए, कई वीवीआईपी लोगों को भी श्रद्धांजलि देने के लिए फूल नहीं मिल सके थे।
असली वाले साहब लोग
रंजीत सिन्हा के सीबीआई चीफ बनने के पहले की सारी कहानी हम आपको लगातार बता रहे है। अब एक और कहानी सुनिए। तीन साहब बहादुर एडिशनल सेक्रेटरी स्तर के लिए इपैनल हुए बिना ही सेक्रेटरी स्तर के लिए इपैनल हो चुके हैं। नाम भी बताए देते हैं। नंबर एक हैं 1979 बैच के आंध्रप्रदेश कैडर के आरपी वाटल, दूसरे हैं 1979 बैच के यूटी कैडर के शक्ति सिन्हा, जो इस समय दिल्ली सरकार के एक बड़े संगठन के सीएमडी हैं। तीसरे हैं राजस्थान के अशोक संपतराम। इनमें से शक्ति सिन्हा की तो छह साल की सीआर तक नहीं मिल रही है। लेकिन कुछ बात है।
जैसे कि एक बात ये है कि वाटल साब नरसिंहराव के पीएस रह चुके हैं और कुछ उनको पेट्रोलियम सचिव बनाने की वकालत कर रहे हैं। जैसे कि एक बात ये है कि अशोक संपतराम के पिता राजस्थान में कांग्रेस के बड़े नेता, मंत्री वगैरह रह चुके हैं। बाकी बातें आप समझते ही हैं।
शीला का आशीर्वाद!
अब देखिए एक हैं दीपक मोहन स्पोलिया। 1979 बैच। अरुणाचल गोवामिजोरमयूटी कैडर। शीला दीक्षित के सबसे खास। कहा जाता है कि उनको दिल्ली में बनाए रखने के लिए शीला दीक्षित ने व्यक्तिगत स्तर पर लड़ाई लड़ी। सेक्रेटरी इपैनलमेंट तो खैर नहीं हुआ, एडीशनल सेक्रेटरी लेवल से ही गुजारा चल रहा है। लेकिन खास बात ये है कि स्पोलिया साबसीएजी विनोद राय के साढू हैं।
जल्द होगा रिव्यू!
अब बात उनकी, जो 1979 बैच के जाने-माने अफसर हैं, लेकिन इपैनल नहीं हो सके। जैसे राजीव टकरू (गुजरात कैडर), भारत भूषण(केरल कैडर), श्रीमती भामावती (बिहार कैडर)। इनके दबाव में 1979 बैच का जल्द ही रिव्यू होने जा रहा है।
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