अंबेडकर को लेकर बवाल, पर इन कार्टूनों का क्या करेगी सरकार?

नई दिल्ली. एनसीईआरटी की किताबों में प्रकाशित अंबेडकर के कार्टून को लेकर पिछले दिनों संसद में खूब शोर शराबा हुआ। कार्टून पहले भी छपते रहे हैं। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर बड़े-बड़े नेताओं के कार्टून छपते रहे हैं लेकिन इस तरह हंगामा पहले नहीं हुआ जैसा अंबेडकर के कार्टून को लेकर हो रहा है। किसी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री ने अपना कार्टून बनाए जाने पर ऐतराज जताया। कार्टूनिस्ट भी कहते हैं कि उनका मकसद किसी को व्यक्तिगत तौर पर निशाना बनाना या किसी समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का नहीं है।
1962 के भारत-चीन युद्ध के फौरन बाद लक्ष्मण ने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और उनके रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन का एक कार्टून बनाया था। उसी शाम लक्ष्मण को प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया। लक्ष्मण ने इस अंदेशे के साथ फोन उठाया कि उन्हें प्रधानमंत्री का कोपभाजन बनना पड़ेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। फोन के दूसरे छोर पर मौजूद भद्र और सौम्य स्वर ने कहा, 'मिस्टर लक्ष्मण, आज सुबह आपका कार्टून देखकर मेरा दिल खुश हो गया। क्या मुझे उसकी आपके द्वारा हस्ताक्षरित एक बड़ी प्रतिलिपि मिल सकती है, जिसे मैं फ्रेम करा सकूं?'
अंग्रेजी अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस' और 'टाइम्स ऑफ इंडिया' ने रविवार के अपने संस्करण में कुछ ऐसे ही चुनिंदा कार्टून प्रकाशित किए हैं। अंबेडकर के कार्टून पर हंगामा बढ़ता देख सरकार ने एनसीईआरटी की किताबों से किसी भी राजनेता का कार्टून हटाने और भविष्य में ऐसे कार्टून नहीं प्रकाशित किए जाने के आदेश दिए लेकिन इन कार्टूनों का क्या होगा जो इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हैं।






