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चुनौतियों पर इंदिरा के जमाने से ही होता रहा है चिंतन

पंकज कुमार पांडेय | Jan 15, 2013, 09:33AM IST
चुनौतियों पर इंदिरा के जमाने से ही होता रहा है चिंतन
नई दिल्ली. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के कार्यकाल में पचमढ़ी और शिमला चिंतन के बाद जयपुर में तीसरी चिंतन बैठक होने वाली है, मगर इस तरह की बैठकों की परंपरा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में ही शुरू हो गई थी। जयपुर की चिंतन बैठक की तैयारियों में परदे के पीछे काम कर रही टीम के एक सदस्य ने
पुरानी यादों को कुरेदते हुए कहा कि जयप्रकाश नारायण के बढ़ते प्रभाव के वक्त कांग्रेस में इस तरह के चिंतन की जरूरत महसूस हुई थी। उस समय पार्टी ने तय किया कि तीन दिन पार्टी की चुनौतियों पर चर्चा होनी चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष के कार्यालय में काम कर रहे रानोज बसु ने बताया कि वर्ष 1974 में 22 से 24 नवंबर तक पार्टी का चिंतन यूपी के नरौरा (बुलंदशहर) में हुआ। इंदिरा गांधी ने यूपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री व पार्टी के बड़े नेता हेमवती नंदन बहुगुणा को बैठक की जिम्मेदारी दी थी।  बड़े नेताओं को कैंप में रुकवाने का फैसला किया गया। वर्ष 1998 में कांग्रेस के सामने फिर नई चुनौती थी। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को खुद को साबित करना था। फिर 2003 में शिमला चिंतन हुआ जब कांग्रेस लगातार छह साल सत्ता से बाहर रहने की वजह से छटपटाहट में थी। अब एक बार फिर कांग्रेस नीत सरकार लगातार आंदोलनों और आरोपों की गिरफ्त से निकलकर राहुल गांधी की अगुवाई में पार्टी में जनरेशन शिफ्ट की तैयारी कर रही है तो चिंतन जयपुर में हो रहा है।
 
 
बदलता रहा वक्त के हिसाब से लक्ष्य
नरौरा में 1974 में पार्टी ने ब्रेन स्टोर्मिंग सेशन के बाद संगठन की मजबूती के लिए 13 बिंदु तय किए थे। पचमढ़ी में 'एकला चलो' के रास्ते पर चलने को कांग्रेस तैयार नजर आई। जबकि शिमला पहुंचते-पहुंचते चिंतन बदला और गठबंधन की वकालत की गई। इस बार चिंतन के पहले ही चुनाव पूर्व गठबंधन पर विचार के लिए एक कमेटी बना दी गई। बिहार और यूपी में असफल प्रयोग के बाद राहुल गांधी की 'एकला चलो' की थ्योरी बदल गई है।
 
 
 
बड़ा तबका महसूस कर रहा खुद को अलग-थलग
बदले वक्त में पार्टी का बड़ा तबका खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है। एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि सत्ता और संगठन में 'डिसकनेक्ट' है। हमें जयपुर चिंतन बैठक में यह बात करनी चाहिए कि कैसे कार्यकर्ताओं की भावनाओं के अनुरूप सरकार आगे बढ़े। कार्यकर्ताओं की सुनी जाए। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व तक उनकी पहुंच हो इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।
 
युवाओं का दबदबा
इस बार चिंतन शिविर में युवाओं का दबदबा देखने को मिल सकता है। शिविर में भाग लेने वाले 350 प्रतिनिधियों में से 160 युवा कांग्रेस और एनएसयूआई से होंगे। यूथ विंग से करीब आधी सहभागिता को चिंतन बैठक में पार्टी महासचिव राहुल गांधी के प्रभाव के तौर पर भी देखा जा रहा है। इससे पहले 1998 में पचमढी और 2003 में शिमला में आयोजित चिंतन शिविरों में पांच से अधिक युवा नेताओं का प्रतिनिधित्व नहीं हुआ था। पार्टी नेतृत्व की ओर से जयपुर शिविर को 'युवा और अनुभव' का ऐसा 'संगम' बताया जा रहा है जो आगामी लोकसभा चुनावों में संप्रग-3 सरकार बनाने के लिए काम करेगा।
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