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इटली के 'धोखे' पर सुप्रीम कोर्ट सख्‍त, राजदूत के देश छोड़ने पर लगाई रोक

संतोष ठाकुर/विनीता पांडेय | Mar 14, 2013, 11:47AM IST
 
 

 
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने इतावली नौसैनिकों के मामले में गुरुवार को इटली सरकार, इटली के राजदूत और दोनों मरीन्स को नोटिस भेजा है। देश की सर्वोच्च अदालत ने इस नोटिस का जवाब 18 मार्च तक देने को कहा है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इटली के राजदूत के देश छोड़ने पर भी रोक लगा दी है। 
 
इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने विदेश मंत्रालय को सलाह दी थी कि वह इतालवी नौसैनिकों के मामले में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध करे कि जिन लोगों ने हलफनामा दिया है, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। इस मामले में राजनयिक लाभ न दिया जाए क्योंकि देश की सर्वोच्च अदालत में हलफनामा देकर उससे मुकरा जा रहा है। गृह मंत्रालय ने यह भी कहा है कि यह विएना समझौते का उल्लंघन नहीं होगा क्योंकि यह किसी राजनयिक के खिलाफ उठाया जाने वाला कदम नहीं बल्कि अदालत को गुमराह करने का मामला है। (इटली से बढ़ सकता है राजनयिक तनाव)
 
गृह मंत्रालय की इस सलाह और प्रधानमंत्री के कड़े रुख के बाद इस बात की आशंका बढ़ गई है कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के मामले में इटली के राजदूत को गिरफ्तार किया जा सकता है। इस केस में इटली की ओर से बतौर वकील मुकदमा लड़ रहे हरीश साल्वे ने इटली सरकार के कदम को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए खुद को पूरे मामले से अलग कर लिया है। साल्वे का कहना है कि चूंकि इटली के राजदूत ने खुद भारतीय कानून व्यवस्था की प्रक्रिया में हिस्सा लिया था, इसलिए उन्हें इस मामले में कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए राजनयिक छूट नहीं मिल सकती है। (मनमोहन के 10 वादे जो अभी तक नहीं हुए पूरे)
 
सूत्रों के मुताबिक इस मामले में गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के सचिव और वरिष्ठ अधिकारियों की एक बैठक हुई। विदेश मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक गृह मंत्रालय के अधिकारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानूनी तौर पर उस व्यक्ति के खिलाफ मामला बनता है, जिसने हलफनामा दिया था। अब सरकार को चाहिए कि वह सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध करे कि वह अवमानना की कार्रवाई शुरू करे। एक अधिकारी के मुताबिक गृह मंत्रालय के अधिकारियों का कहना था कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोलने का है। इधर, विदेश मंत्रालय ने कहा है कि वह अगला कदम 22 मार्च के बाद तय करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह समयावधि दी है। 
 
विदेश मंत्रालय ने एक बार फिर से इटली के राजदूत को बुलाकर उन्हें बढ़ते दबाव से अवगत कराने का निश्चय किया है। एक अधिकारी ने कहा कि जहां तक इटली से अपने राजदूत बुलाने का सवाल है तो फिलहाल वहां कोई राजदूत नहीं है। इसके साथ ही यहां से इटली के राजदूत को वापस उसके देश भेजने जैसे कदम से पहले सरकार इटली सरकार पर अन्य तरीके से दबाव बनाना चाहती है। इसमें मंत्री स्तरीय वार्ता, प्रतिनिधिमंडल के माध्यम से बातचीत के विकल्प शामिल हैं। इस मामले के यूरोपीय संघ से संबंधों पर असर को लेकर एक अधिकारी ने कहा कि यह द्विपक्षीय मामला है इसलिए यूरोपीय संघ से संबंध खराब होने का सवाल नहीं है। हालांकि इस मोर्चे पर भी सरकार सतर्क है। इस मामले पर पूर्व विदेश राज्यमंत्री और वर्तमान मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री शशि थरूर ने कहा, ‘निश्चित तौर पर इटली मामले में कड़ा संदेश देने की जरूरत है। हमें चाहिए कि संतुलित लेकिन स्पष्ट संदेश दें कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।’ 
 
कड़े कदम पर पूर्व राजनयिकों की राय बंटी 
सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर इटली के राजदूत राजनयिक छूट के दायरे से बाहर आ गए हैं। कई पूर्व राजनयिक मानते हैं कि हलफनामा देने के बाद उससे मुकरना अदालत की अवमानना का स्पष्ट मामला है। इस मामले में वे राजनयिक छूट के हकदार नहीं हैं। लेकिन कुछ कड़े कदम के हिमायती नहीं हैं। उनकी राय में कूटनयिक दबाव से राह निकाली जानी चाहिए। 
 
इटली में तैनात रहे पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा ने कहा कि जैसे ही कोई राजनयिक किसी अदालत में पहुंचता है तो वह राजनयिक छूट के दायरे से बाहर चला जाता है। उन्होंने कहा, ‘इटली के राजदूत ने सुप्रीम कोर्ट को दो मायनों में गुमराह किया है। एक, यह कि इतालवी नौसैनिकों को सिर्फ वोट डालने के लिए इटली जाना जरूरी है। यह गलत है क्योंकि वे यहीं से वोट डाल सकते थे। और दूसरे, यह कि वे वोट डालने के बाद लौट आएंगे। अब सुप्रीम कोर्ट को देखना है कि वह इन दोनों मुद्दों पर क्या नजरिया अपनाता है। हालांकि कानूनी मामले के अलावा यह सरकारी कार्रवाई का भी मामला है। ’डोगरा के मुताबिक भारत को पहली बार गुमराह नहीं किया गया है। उन्होंने बताया, ‘1998 में दो फ्रांसीसियों को कोच्चि में जासूसी करते पकड़ा गया था। वे लौटने का लिखित वादा करके फ्रांस गए और फिर नहीं आए। पिछले साल जुलाई में एक अमेरिकी जंगी जहाज ने दुबई के निकट दो भारतीय मछुआरों को मार डाला और कई को घायल कर दिया। उस पर भी कुछ नहीं हुआ। श्रीलंका की नौसेना अक्सर भारतीय मछुआरों पर हमला करती है और एक मामले में तो एक मछुआरे को रस्सी से बांधकर मीलों घसीटा गया था। ये सभी देश यह सोच लेते हैं कि भारत तो कुछ बोलेगा नहीं। अगर इटली को उन दोनों को वापस भेजना था तो वहां से चिट्ठी नहीं आती।’ 
 
लेकिन कुछ दूसरे राजनयिक इटली के राजदूत के लिए गिरफ्तारी जैसे कदम को ‘घातक’ बताते हैं। पूर्व कूटनयिक जी. पार्थसारथी ने कहा, ‘इटली के राजदूत को भारतीय कानूनों के दायरे में लाना संभव नहीं है। सबसे कड़ा कदम यही हो सकता है कि राजदूत को वापस भेज दिया जाए, दूतावास का आकार छोटा कर दिया जाए, अपना राजदूत वहां से बुला लिया जाए और व्यापारिक रिश्ते तोड़ लिए जाएं। लेकिन ये सभी कड़े कदम हैं। इसके बदले भारत अगस्तावेस्टलैंड सौदे को रद्द करके उसे आर्थिक दंड पहुंचा सकता है।’ पूर्व राजनयिक केपी फैबियन का कहना है, ‘इटली के राजदूत भले अदालत में गए हों या कायदों का उल्लंघन किया हो तो उससे क्या हो जाता है। राजदूत को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे पक्ष को दंडित करने का मतलब है कि अपने ऊपर हमले को न्योता देना। इसके बदले भारत को चतुराई से कूटनयिक दबाव बनाना चाहिए।’ उनका इशारा यह है कि अगर भारत कड़ा कदम उठाएगा तो इटली भी दबाव बढ़ा सकता है। 
 
 
 
इतालवी मरीन मुद्दे को भाजपा ने बताया भारत की संप्रभुता पर हमला 
भारतीय मछुआरों के हत्या के आरोपी दो इतालवी नौसेनिकों को वापस नहीं भेजने की घटना को मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने देश की संप्रभुता को चुनौती बताया है। पार्टी ने कहा है कि इटली ने छल और धोखा के जरिए हमारी संप्रभुता को चुनौती दी है और ऐसे में इटली के राजदूत पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने उन उपायों का जिक्र भी किया है जिसके तहत इटली के राजदूत को राजनयिक छूट के दायरे से दूर रखा जा सकता है। 
 
राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान यह मामला उठाते हुए नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा कि भारतीय कानून के तहत इन दोनों को अपने मताधिकार का उपयोग करने के लिए कैसे इटली जाने दिया गया, यह आश्चर्यजनक है। भारतीय कानून के तहत किसी कैदी को मताधिकार का उपयोग करने के लिए जेल से बाहर जाने की इजाजत नहीं है। वैसे भी इटली के गृह मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक जेल में बंद व्यक्ति डाक के द्वारा अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकता है। ऐसे में दोनों को देश से बाहर क्यों जाने दिया गया, यह आश्चर्यजनक है। राज्यसभा में पार्टी के उपनेता रविशंकर प्रसाद ने सरकार से यह जानना चाहा कि जब अदालत में इन दोनों ने बाहर जाने की इजाजत मांगी तो सरकार के वकील ने अदालत में विरोध किया या नहीं? क्या सरकार ने अपने वकील को कोई निर्देश दिया था? बाद में संवाददाताओं से बातचीत में रविशंकर प्रसाद ने कहा कि भारतीय जेल में बंद किसी भी नागरिक को न तो वोट देने के लिए न ही पर्व त्यौहार मनाने के लिए बाहर जाने की इजाजत दी गई है। ऐसे में इटली के इन दोनों नौसेनिकों को कैसे एक बार क्रिसमस मनाने और फिर वोट डालने के लिए बाहर जाने दिया गया। उन्होंने आशंका जताई कि इस मामले को ढ़ाल मनाते हुए सरकार यह कहेगी कि अगस्तावेस्टलैंड मामले में इटली सहयोग नहीं कर रहा है क्योंकि इतालवी नौसैनिकों के मुद्दे से मामला संवेदनशील हो गया। भाजपा का कहना है कि इतालवी राजदूत पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। राजनयिक छूट के प्रावधान इसमें बाधक नहीं होंगे। 
 
सरल उपाय 
नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने यह तर्क भी दिया है कि ठोस विरोध दर्ज कराने का एक सरल तरीका राजदूत को वापस भेजना है या फिर इटली से अपने राजनयिक को वापस बुलाना। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है कि दोनों इतालवी नौसैनिकों को भगौड़ा घोषित किया जाए और इंटरपोल की मदद से उन्हें वापस भारत लाया जाए। सरकार को इस दिशा में तुरंत ठोस कदम उठाना चाहिए क्योंकि यह पूरा प्रकरण भारत की संप्रभुता पर सीधा आघात है और पूरे दुनिया में यह संदेश जाएगा कि भारत एक सॉफ्ट स्टेट है। 
 
(तस्वीर: केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने बुधवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच इटली के नौसैनिकों से जुड़े मामले सहित कई मुद्दों पर चर्चा हुई)
 
 
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