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आंध्रप्रदेश में था अगवा कलेक्‍टर प्रकरण का कंट्रोल रूम

dainikbhaskar.com | May 04, 2012, 10:19AM IST
 
 


रायपुर.सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन शुक्रवार को सुकमा पहुंच गए। 12 दिन कब्‍जे में रखने के बाद गुरुवार को उनकी रिहाई हुई थी। इसके साथ ही इस प्रकरण का पटाक्षेप जरूर हो गया, लेकिन पूरे मामले में आंध्रप्रदेश से जुड़े तार काफी कुछ कह रहे हैं। राज्य सरकार और आला अफसरों के पास इस बात की पुख्ता जानकारी है कि सब कुछ आंध्रप्रदेश से ही ऑपरेट हो रहा था। यहां तक कि अपहरण का मास्टर माइंड रमन्ना भी आंध्रप्रदेश का ही नक्सली नेता है।
आंध्रप्रदेश से जिस तरह घटनाओं की शुरुआत हुई, वह भी महज संयोग नहीं हो सकता। कलेक्टर का अपहरण होता है तब वार्ताकार बीडी शर्मा आंध्रप्रदेश थे। दूसरे वार्ताकार प्रो. जी हरगोपाल आंध्रप्रदेश के हैं। दोनों नक्सली नेता से मिले बिना ही सरकार के मध्यस्थों से बात करने बैठ गए। प्रारंभिक दो दौर की बातचीत के बाद ही दोनों जंगल में जाकर नक्सली नेताओं से मिलते हैं।  
इस बीच नक्सलियों की मांग में आठ के बजाय 17 हार्डकोर नक्सली नेताओं को छोड़ने की मांग जुड़ जाती है। नक्सली नेताओं के पास रातभर रुकने के बाद रायपुर में फिर वार्ता शुरू होती है पर इसमें कई बार व्यवधान आता है। हर बार नक्सलियों के वार्ताकार नक्सली नेताओं से संपर्क कर उनसे बात करते हैं। 
यानी रायपुर में बैठकर वे ऐसी जगह में बैठे नेताओं से बात करते हैं जहां मोबाइल का नेटवर्क काम करता है। यानी जाहिर सी बात है ताड़मेटला में बैठे नेताओं से वार्ताकार संपर्क नहीं कर रहे थे। उनकी बातचीत हो रही थी जहां पर नेटवर्क काम करता है। जानकारों का दावा है कि वे सीधे हैदराबाद में बैठे नेताओं से बात कर ही वार्ता को आगे बढ़ रहे थे। 
इसमें तो यहां तक कहा जा रहा है कि समझौते के पहले जब दोनों पक्षों की वार्ता टूट गई थी तब भी हैदराबाद में बैठे नेताओं से बात कर दोबारा वार्ता की भूमिका तैयार की गई। उसके बाद समझौते का मसौदा तैयार करते समय भी हैदराबाद कनेक्शन ने ही काम किया। 
वहां बैठे नेता तो चाहते थे कि सलवा जुड़ूम आंदोलन आदि के बारे में भी समझौता किया जाए लेकिन सरकार के वार्ताकार इसके लिए तैयार नहीं हुए। बाद में कलेक्टर की रिहाई के लिए तिथि तय करने से लेकर वार्ताकारों को ताड़मेटला भेजने की प्रक्रिया में भी हैदराबाद में बैठे नक्सली नेताओं की भूमिका मानी जा रही है। 
कहा जा रहा है कि आंध्रप्रदेश में पुलिस का दबाव बढ़ने के कारण वहां पर नक्सली गतिविधियां कम हो गई हैं लेकिन उन्होंने आंध्रप्रदेश से ही छत्तीसगढ़ की गतिविधियों को संचालित करने की रणनीति अख्तियार कर ली।
 
 

 

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