दुष्कर्म रोकने के लिए दो शीर्ष संस्थानों की सिफारिशें महज खानापूर्ति
महिला संगठनों ने केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्रालय और राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से जस्टिस वर्मा कमेटी को भेजी गई सिफारिशों पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा है कि महिलाओं की हित रक्षा के लिए बने ये दोनों सर्वोच्च संस्थान दुष्कर्म और उत्पीडऩ से महिलाओं की रक्षा के ठोस उपाय सुझाने में नाकाम रहे हैं। संगठनों का आरोप है कि दुष्कर्म की घटनाओं को रोकने के लिए बड़े बदलाव की सिफारिश के बजाय इन दोनों संस्थानों ने सिर्फ खानापूर्ति की है।
राष्ट्रीय महिला आयोग ने १५ जनवरी को जस्टिस वर्मा कमेटी को अपनी सिफारिश सौंपी। महिला व बाल विकास मंत्रालय जनवरी के पहले हफ्ते में ही अपनी २५ सूत्री सिफारिशें कमेटी को सौंप चुका है। महिला अधिकारों के लिए सक्रिय संस्था ‘सेंटर फॉर सोशल सर्विस’ की प्रमुख रंजना कुमारी ने कहा कि दोनों ही बड़ी संस्थाओं ने सिर्फ निराश किया है। दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध को रोकने के लिए न्याय-व्यवस्था में बड़े बदलाव की सिफारिश होनी चाहिए थी। लेकिन महिला व बाल विकास मंत्रालय और महिला आयोग दोनों ने ही ऐसा नहीं किया। उन्होंने कहा कि महिला उत्पीडऩ पर मंत्रालय और आयोग ने अपनी पुरानी सिफारिशों को ही आगे बढ़ा दिया। जबकि जस्टिस वर्मा कमेटी के सामने इन दोनों संस्थाओं की राय सबसे महत्वपूर्ण होती।
स्त्री मुक्ति संगठन की वरिष्ठ सदस्य लोकेश का कहना है कि महिला व बाल विकास मंत्रालय की सिफारिशों में कुछ भी ठोस नहीं है। दुष्कर्म मामले पर २८ दिसंबर को मंत्रालय ने सिविल सोसाइटी के साथ बैठक की थी। इसमें कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए थे। मंत्रालय ने इनमें से ज्यादातर सिफारिशों को प्रभावहीन बनाकर आगे बढ़ा दिया है।