जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी दिल्ली गैंगरेप के मामले में नाबालिग आरोपी पर भी बाकी आरोपियों की तरह ही मुकदमा चलाए जाने की मांग कर रहे हैं। स्वामी की याचिका को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) ने गुरुवार को खारिज कर दिया जिसके बाद स्वामी ने हाईकोर्ट में अपील करने का फैसला किया।
संयुक्त राष्ट्र की 'कन्वेंशन ऑफ द राइट्स ऑफ द चाइल्ड' के तहत अधिकतम 18 वर्ष तक की उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना गया है। हालांकि 'बच्चा' माने जाने की न्यूनतम आयु को निर्धारित नहीं किया गया है। इस कन्वेंशन के तहत किसी भी बच्चे के अधिकारों की रक्षा करना राज्य का दायित्व है। संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में से तीन देशों ने इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं जिसमें अमेरिका बड़ा देश है।
जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्विटर पर नाबालिग आरोपी को मुसलमान बताकर कांग्रेस से जोड़ रहे हैं जबकि संयुक्त राष्ट्र में पारित कन्वेंशन जिसका भारत भी एक सदस्य स्पष्ट कहती है कि यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह किसी भी बच्चे के साथ उसके रंग, जाति, धर्म या जन्म के स्थान के आधार पर कोई भी भेद न होने दे। यही नहीं पारित कन्वेंशन यह भी कहती है कि राज्य प्रत्येक बच्चे के जीने के अधिकार को सुनिश्चित करे। इस आधार पर नाबालिग आरोपी को मौत की सजा किसी भी परिस्थिति में नहीं दी जा सकती।
कन्वेंशन ऑफ द राइट्स ऑफ द चाइल्ड के आर्टिकल 8 के तहत किसी भी बच्चे के पास अपनी पहचान छुपाने का अधिकार है। राज्य की जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करे की किसी भी गैरकानूनी तरीके से किसी बच्चे की पहचान सार्वजनिक न हो।
दिल्ली गैंगरेप का नाबालिग आरोपी लंबे वक्त से अपने परिवार से दूर था और विषण परिस्थितियों में अपना जीवन गुजार रहा था। यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह प्रत्येक बच्चे को अपनी सोच, समझ और बौद्धिक क्षमता विकसित करने और बेहतर जीवन पाने का माहौल सुनिश्चित कराए। एक नाबालिग का इतने जघन्य अपराध में शामिल होना भी एक राष्ट्र के रूप में भारत की नाकामी ही दर्शाता है।
राइट्स ऑफ द चाइल्ड कन्वेंशन के आर्टिकल 37 के मुताबिक किसी भी अपराध के लिए किसी भी बच्चे के फांसी या उम्रकैद की सजा नहीं दी जा सकती। यदि सजा देना जरूरी है तो कम से कम सजा दी जाए।
भारत के महिला एवं बाल कल्याण विभाग ने संयुक्त राष्ट्र की राइट्स ऑफ द चाइल्ड कन्वेंशन को स्वीकार किया है और इसे लागू करने के लिए कदम भी उठाए हैं। भारत में अलग-अलग कानूनों के तहत किसी को बच्चा मानने की न्यूनत आयु तय की गई है। सेक्सुअल कन्सेंट के लिए लड़कों की कोई न्यूनतम आयु निर्धारित नहीं की गई है जबकि लड़कियों के लिए कम से कम 16 वर्ष की आयु तय की गई है। यही नहीं 18 वर्ष से अधिक उम्र का व्यक्ति ही भारतीय सैन्य बलों के अभियानों में शामिल हो सकता है। जबकि 16 वर्ष की उम्र तक के व्यक्ति खुद को सैन्य सेवाओं के लिए उपलब्ध करवा सकते हैं।
चाइल्ड लेबर एक्ट के तहत कम से कम बच्चों के लिए 14 वर्ष की न्यूनतम आयु तय की गई है। 14 साल से कम उम्र के प्रत्येक नागरिक को बच्चा माना जाता है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 83 के तहत स्पष्ट किया गया है कि 7 वर्ष तक की उम्र का बच्चा अपराध नहीं कर सकता जबकि 12 वर्ष से कम उम्र का बच्चा यदि कोई अपराध करता है तो उसे सजा नहीं दी जा सकती। द जुवेनाइल जस्टिस एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन एक्ट 2000 के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के नागरिक को 'बच्चा' माना गया है और यह निर्धारित किया गया है कि अपराधों में लिप्त नाबालिगों के मामलों की सुनवाई जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड करे।