दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता अशोक अग्रवाल के मुताबिक भारत सरकार ने चाइल्ड राइट्स के मामले में संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन पर दस्तखत कर रखे है। हमारे संविधान के आर्टिकल 51 के मुताबिक सरकार किसी अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन का उल्लंघन नहीं कर सकती। दिल्ली गैंगरेप के नाबालिग आरोपी को सख्त सजा देने के लिए मौजूदा कानून में संशोधन जरूरी है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है क्योंकि भारत ने इंटरनेशल समझौते पर दस्तखत किए हुए हैं।
एडवोकेट अशोक अग्रवाल कहते हैं, 'या तो यह माना जाए कि वह आरोपी बच्चा है ही नहीं, यदि यह बच्चा है तो फिर उसे हमें बच्चे की तरह ही ट्रीट करना चाहिए। हमें रिफोर्मेटिव एटीट्य़ूड अपनाना चाहिए ताकि उस बच्चे को सुधरने का एक मौका मिल सके। यदि कोई बच्चा अपराध करता है तो उसमें बच्चे की नहीं राष्ट्र की गलती है। नाबालिग के लिए सख्त सजा की मांग करना जायज नहीं है। हमें बच्चे को सुधारने पर जोर देना चाहिए।'
जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका के विषय में एडवोकेट अशोक अग्रवाल कहते हैं कि याचिका दायर करने से भारत की जो हार्ड रियलटी है वह बदल नही सकती। स्वामी की याचिका राजनीति से प्रेरित है, वह सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए इस मुद्दे को उछाल रहे हैं। स्वामी यह भी बताए कि क्या कभी उन्होंने बच्चों की शिक्षा या अन्य अधिकारों को लेकर कभी कोई याचिका दायर की है?
यह सच है कि दिल्ली गैंगरेप ने हमारी संवेदनाओं को झकझोरा है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम भावनाओं में बहकर कानून को बदल दें। मैं कानून को न बदलने की वकालत नहीं कर रहा हूं बल्कि मेरा जोर इस बात पर है कि सिर्फ एक मामले को अपवाद नहीं माना जाना चाहिए। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब किसी नाबालिग ने अपराध किया हो। यदि कानून बदलना ही है तो फिर विशेषज्ञ इस पर चिंतन कर सकते हैं।
राइट्स ऑफ द चाइल्ड कन्वेंशन पर अमेरिका ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इस विषय में एडवोकेट अशोक अग्रवाल कहते हैं कि अमेरिका की परिस्थितियां अलग हैं, वहां के कुछ राज्य कम उम्र के बच्चों को भी अपराधी की श्रैणी में रखते हैं। हालांकि राज्यों ने यह फैसला भी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विशेषज्ञों की राय पर ही लिया है।