दिल्ली गैंगरेप के नाबालिग आरोपी को सख्त सजा दिए जाने की मांग के विषय में बचपन बचाओ आंदोलन से जुड़े एडवोकेट भुवन रिभू कहते है कि उसने जो किया है उसे डिफेंड नहीं किया जा सकता न ही जायज ठहराया जा सकता है। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि जिस दिन यह अपराध हुआ उससे थोड़े दिन पहले तक यह बच्चा स्वयं एक विक्टिम था। वह चाइल्ड ट्रेफिकिंग का शिकार हुआ है। उसे बाल मजदूरी करनी पड़ी, अभी हम यह नही जानते हैं कि वह और किस तरह के हालातों में रहा। हमारी सबसे पहली जरूरत अपने ऑब्जरवेशन होम सिस्टम को बदलने की है। हमें तीन बातों पर चिंतन करना होगा। पहला- हम सामाजिक तौर पर किस तरह से उस बच्चे को सुरक्षा देने में फेल हुए हैं। दूसरा-क्या मौजूदा सजा उसे सुधरने का अवसर दे पायगी? और तीसरे क्या 18 वर्ष से कम उम्र के नागरिकों को बच्चा मानने की व्यवस्था सही है?
राइट्स ऑफ द चाइल्ड अंतरराष्ट्रीय कन्वेंश के बारे में एडवोकेट भुवन रिभू कहते हैं कि अमेरिका इकलौता बड़ा देश है जिसने इस कन्वेंशन पर साइन नहीं किए हैं। भारत से अमेरिकी का क्रिमनल जस्टिस सिस्टम की तुलना नहीं की जा सकती। अमेरिका में ऐसा शायद ही कोई मामला आता हो जहां ट्रेफिकिंग के शिकार बच्चे का सात साल तक शोषण किया गया हो।
गौर करने वाली बात यह है कि हमारा जस्टिस सिस्टम इस आरोपी के गुनाहगारों को सजा नहीं दे पा रहा है। स्वयं हाईकोर्ट ने इस बात का संज्ञान लिया है कि यह बच्चा इतने लंबे वक्त तक उत्पीड़न का शिकार कैसे होता रहा। हाई कोर्ट ने इस मामले में ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर और सचिव लेबर को तलब करके फटकार लगाई है जो हमारी व्यवस्था की पोल खोलता है।