बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक कैलाश सत्यार्थ नाबालिग मानने की उम्र बदलने के पक्ष में नहीं है। वह कहते हैं, 'हम जूवेनाइल की उम्र को बदलने के पक्ष मे नहीं है। हमार मानना नहीं है कि एक घटना के आधार पर कानून में बदलाव नही हो सकता है। यह सच है कि लोगों गुस्सा है, आक्रोश है। यदि भावनाओं में बहकर कानून बदला गया तो भविष्य में इसका खामियाजा लाखों अन्य बच्चों को उठाना पड़ सकता है।
कड़वा सच यह है कि अपराधों में पकड़े गए ज्यादातर आरोपी बच्चे खुद ही विक्टिम होते हैं। हमारे पूरे सामाजिक सिस्टम की नाकामी के कारण ऐसा होता है। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में बच्चों को केयर और प्रोटेक्शन की गारंटी दी गई है, लेकिन सरकार यह प्रोटेकश्न देने में बुरी तरह नाकाम हुई है। यदि इन बच्चों को सही तरीके से सुधारा जाता तो शायाद हालात ऐसे नहीं होते।
शिक्षा के अधिकार का कानून एवं बच्चों के सामाजिक उत्थान के लिए बनाए गए अन्य कानून पूरी तरह नाकाम हुए हैं। 14 से 18 की उम्र के बीच के नाबालिगों का इस्तेमाल संगठित अपराधों में हो रहा है। नशीली दवाइयों की तस्करी का धंधे, भीख मंगवाने का धंधे एवं वेश्यावृत्ति के धंधे में बच्चों को धकेला जा रहा है। इस केस में भी इस लड़के का इस्तेमाल पीड़ितों को बुलाने के लिया गया।
अगर यह लड़का 18 साल से कम उम्र का है तो फिर हमें इस बात का जबाव तलाशना होगा कि हमारी सामाजिक एजेंसिया, समाज कल्याण एजेंसिया क्या कर रही हैं। एक बच्चा जिसे परिवार की सुरक्षा में होना चाहिए था वह अपराध में कैसे संलिप्त पाया गया।
जस्टिस वर्मा की रिपोर्ट ने मिसिंग चिल्ड्रन का मामला भी गंभीरता से उठाया है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर घंटे में सात बच्चे गायब होते हैं। यह दर्शाता है कि हमारा पूरा समाज और सरकार बच्चों को बचाने में असफल है। ऐसे में नाबालिग आरोपी पर सवाल उठाने से पहले हमें अपनी सामाजिक और सरकारी एजेंसियों का एक बार फिर से मूल्यांकन करना होगा।