वह बताते हैं कि शुरुआती दस दिनों तक पीड़ित कभी होश में आती, फिर बेहोश हो जाती। जब उसे घर जाने की बात कहते थे वह रोमांचित हो जाती थी और मुस्कुराने लगती थी। वह जीना चाहती थी, लेकिन उसकी आंत निकालनी पड़ी, जिसके बाद हालात मुश्किल हो गए और तमाम कोशिशों के बावजूद वह दुनिया छोड़ गई। उसने पुलिस को दो बार बयान दिए थे। उस समय उसके पिता के लिए वहां बैठना मुश्किल हो जाता था, क्योंकि वह बेटी की आपबीती सुन नहीं पाते थे। वह बताते हैं कि उनकी पत्नी उस दौरान मौजूद रहती थी और बेटी की आपबीती सुन कर अपने आंसू रोक नहीं पाती थी।