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"विश्वास" कीजिए "जंग" में छाया हिन्दुस्तानी कवि

 
Source: Mukesh Kumar Gajendra   |   Last Updated 08:21(06/02/12)
 
 
 
 
नई दिल्ली। पकिस्तान के प्रमुख उर्दू अखबार "जंग" में वरिष्ठ उर्दू पत्रकार किश्वर नाहीद ने युवा कवि कुमार विश्वास के बारे में सम्पादकीय आलेख लिखा है। कुमार की शख्शियत सरहद पार पहुंच गई है। किश्वर नाहीद का लेख इस प्रकार है-

मुशायरे में क्म्पेयरर (संचालक) की कितनी हैसियत और अहमियत है इस का जायका इंदौर,उज्जैन और भोपाल जा कर मालूम हुआ. इन सब जगहों के मुशायरों के क्म्पेयरर हिंदुस्तान के दुबई तक मशहूर नौजवान "कुमार विश्वास" थे.

इन को अन्ना हजारे के प्रोग्राम और आन्दोलन में शिरकत करने, तकरीर करने, शेर सुनाने और वो भी तरन्नुम से सुनने में इतनी मकबूलियत मिली की शायरों की आमद पर कुछ तालियां बजतीं थीं मग़र कुमार विश्वास के हर जगह दाखिल होते हीं सारा हाल तालियों से गूँज उठता था.

इस का ज़हनी उठान भी ऐसा है की अबू-अल-कलाम से लेकर फ़िराक साहिब तक के अशार याद थे और मौका महल के मुताबिक अशार का खूबसूरत इस्तमाल इस हद तक किया की अगर मुशायरा पांच घंटे चला तो उस में दो घंटे कुमार विश्वास के बोलने पर खर्च हुए.

अभी उस का बोलना खत्म हुआ की मुशायरे के इखितिताम पे उस ने अपने अशआर सुनाने शुरू कर दिए .वो इस लिए की नौजवानों की फरमाइश थी और मुसलसल फरमाइश के बाद जब उस ने शुरू किया "कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है" तो नौजवानों ने भी उस के साथ गाना शुरू कर दिया.

कमाल की बात यह थी की हर शहर के मुशायरे की इखितिताम पर कम से कम 45 मिनिट तक कुमार विश्वास अपने अशआर सुनाता था और नौजवान थे की वारी-सदके होते जाते थे."
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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