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कोलकाता में 2200 पंडालों पर 500 करोड़ खर्च

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कोलकाता से विजय मनोहर तिवारी की रिपोर्ट. शहर के भीतर बांस-बल्ली और रंग-रोशनी का एक नया ही शहर। रातभर जगमगाते 22 सौ पंडाल। दुर्गा की एक से बढ़कर एक भव्य प्रतिमाएं। इनकी झलक पाने के लिए सुबह से रात तक सड़कों पर उतरे लाखों लोग। यह बंगाल के सबसे बड़े उत्सव की धूम है, जिसके लिए कोलकाता दुल्हन की तरह सजा है। संस्था जनसंसार का सर्वे बताता है कि बड़ी पूजाओं का बजट ही 40 लाख से डेढ़ करोड़ के बीच है। इस हिसाब से करीब पांच सौ करोड़ रुपए इस साल खर्च होंगे। 
 
बंगाल में दुर्गा के विभिन्न रूपों के दर्शन व शास्त्रोक्त ढंग से पूजा की ही खास अहमियत है। शनिवार को थी षष्ठी यानी पूजा का पहला दिन। शहर भर में गंगा किनारे से कोला बोऊ यानी केले के पत्ते दुल्हन की तरह सजाकर लाए गए। दुर्गा के समक्ष घटस्थापना हुई। फिर सुबह श्लोकों के साथ हवन और पूजा। दोपहर आरती। भोग में पुलाव, खिचड़ी, तीन सब्जियां, पूरी, पकवान। दोपहर में फूल चढ़ाने की रस्म-अंजलि। शाम की पूजा, जिसे बोधन कहते हैं। बिल्कुल ब्रज के 'ठाकुरजी' की तरह विजयादशमी तक हर बारीक चीज का ध्यान। 
 
लाल बॉर्डर वाली सफेद-पीली साड़ी में महिलाएं। नए कपड़ों में घर के बाकी लोग। युवाओं पर नए फैशन की छाप। हर कोई सजा-संवरा। इनके लिए पांच दिन पर्याप्त नहीं हैं कि शहर के कोने-कोने में सजी देवियों को देख पाएं। इसलिए ज्यादा समय लोग घर के बाहर ही हैं। रेस्टॉरेंट-होटलों और फुटपाथ पर खाने-पीने की दुकानों पर भीड़ टूटी हुई है। दो महीने से जारी खरीदारी खत्म होने का नाम नहीं ले रही। शोरूम, मॉल्स और बाजारों में पैर रखने की जगह नहीं है। 
 
घरों से निकले और दूर-दूर से आए लोगों को कुछ नया दिखाना दुर्गा पूजा के आयोजकों की बड़ी चुनौती है। सौ बड़े जलसे ऐसे हैं जैसे सौ फिल्में एक साथ रिलीज हों। मोहम्मद अली पार्क की पूजा इस मुकाबले में टॉप टेन में है। फीफा वर्ल्‍ड कप 2010 के फाइनल की तर्ज पर पांडाल को जोहानिसबर्ग के स्टेडियम की शक्ल दी गई है। कॉलेज स्क्वेयर के स्विमिंग पूल पर कन्याकुमारी की विवेकानंद रॉक की शानदार प्रतिकृति बनी है। एकडालिया इलाके में सोने के मंदिर का लुक दिया गया है। नॉर्थ कोलकाता में बच्चों के नजरिए से देवी के रूप पर कार्टून फिल्मों की छाप है। रात को रंगीन रोशनियों से नहाए इन पांडालों के बाहर पूरा बंगाल जैसे कोलकाता में आ डटा है। संस्था जनसंचार के सामाजिक कार्यकर्ता गीतेश शर्मा कहते हैं कि बंगाल में इस पूजा परंपरा की गहरी जड़ों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अखंड बंगाल का हिस्सा रहे वर्तमान बांग्लादेश में भी न सिर्फ इस दौरान छुट्टी होती है बल्कि टीवी चैनलों पर दुर्गा पूजा की बेहतरीन कवरेज भी। किसी मुस्लिम देश में ऐसा नहीं होता। 
 
35 साल बाद नेता जनता के जलसे में 
 
34 सालों के कम्युनिस्ट शासन में पश्चिम बंगाली सरकार ने पूजा पंडालों से दूरी बनाए रखी। हालांकि बाद में सीपीएम के पूर्व सांसद मोहम्मद सलीम दुर्गा पूजाओं के सबसे लोकप्रिय मेहमान बनकर सामने आए। फिर भी साम्यवादियों में ऐसे नेता गिने-चुने ही रहे। पहली बार बंगाल की जनता अपने प्रतिनिधियों को अपने बीच पाकर प्रसन्न है। हर आयोजन समितियों के आमंत्रण पत्रों पर ममता सरकार के सारे मंत्री, सांसद, विधायक और पार्टी पदाधिकारियों के नाम हैं। वे किसी न किसी आयोजन से सीधे जुड़े हैं, दूसरे समारोहों में बतौर मेहमान भी हिस्सा ले रहे हैं। जनता की नब्ज को ध्यान में रखकर ही ममता बनर्जी ने दस दिनों की छुट्टी घोषित की है। ऐसा क युनिस्ट शासन में कभी नहीं हुआ। इस उत्सव को राजाओं और जागीरदारों की हवेलियों से निकलकर आम आदमी की जिंदगी का हिस्सा बने 255 साल हो चुके हैं। क युनिस्ट सरकार के दौरान यह उत्सव सिर्फ जनता तक सीमित रहा। कुछ पांडालों के बाहर सीपीएम के कार्यकर्ता सा यवादी साहित्य के स्टाल्स सजाते थे। सत्ता परिवर्तन के बाद वे भी नदारद हैं। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की लालबत्तियां जरूर जगमगा रही हैं। 
 
 
प्लासी की लड़ाई में जीत का धन्यवाद पहली पूजा में 
 
अंग्रेजों ने नवाब सिराजुद्दौला को प्लासी की लड़ाई में हराकर ही बंगाल में सत्ता कायम की थी। जून 1757 की उस जीत के बाद जनता को धन्यवाद देने के लिए ब्रिटिश सेना प्रमुख रॉबर्ट क्लाइव ने राजा नबकृष्णदेव के खास आयोजन में शिरकत की थी। कोलकाता के इतिहास में यह दुर्गा पूजा का पहला सार्वजनिक आयोजन माना जाता है। 
 
देश भर से बंगाली अपने गांव-घरों को लौटे हुए हैं। जमशेदपुर से आटोमोबाइल इंजीनियर शुभदीप कृष्णदेव के लिए इस मौक पर यहां आना कोलकाता वालों के लिए भी खास मायने रखता है। वे राजा नबकृष्णदेव के ही वंशज हैं। शोभा बाजार स्थित राजाबाटी के परिसर में 255 साल से पूजा की शानदार परंपरा है। प्लासी की लड़ाई में अंग्रेजों ने नवाब सिराजुद्दौला को हराया था। रॉबर्ट क्लाइव ही नहीं यहां वॉरेन हेस्टिंग्ज समेत कई ब्रिटिश अफसर भी पूजा में शरीक होते रहे। शुभदीप बताते हैं, 'स्वामी विवेकानंद शिकागो से लौटने के बाद 1897 में यहां भी आए थे। आज पूरा कोलकाता यहां आता है।' 
 
कोलकाता में उत्सव के विस्तार ने शास्त्रोक्त ढंग से पूजा करने वालों को काम के मौके बढ़ा लिए हैं। पंडितों की मांग बढ़ी है। इसे पूरा करने के लिए बंगाल पंडित-पुरोहित संघ ने पहले ही तैयारी की। मानिकतला मंदिर में उन्होंने पुजारियों के लिए क्रेश कोर्स चलाया। संघ के अध्यक्ष नेताई चक्रबर्ती ने कहा कि एक सप्ताह के इस कार्यक्रम में कई युवा पंडितों ने भागीदारी की है। एक पंडित ने बताया कि इस संक्षिप्त पाठ्यक्रम से उन्हें संस्कृत के उच्चारण की कमियों को दूर करने का मौका मिला। 
 
34 साल बाद पूजा में सरकार 
 
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दस दिन की छुट्टी घोषित करने के साथ पहले ही दिन 12 स्थानों पर पूजा में शरीक हुईं। जबकि सीपीएम की सरकार के 34 सालों में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य कभी किसी पूजा में नहीं गए। 
 
(फोटो: कोलकाता के मोहम्मद अली पार्क में बनाया गया यह पंडाल जोहानिसबर्ग के उस स्टेडियम की तर्ज पर है, जहां 2010 का फुटबॉल विश्वकप हुआ था। फोटो-गणेश शर्मा) 
 
 

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