मानव मन की इंजीनियरिंग समझने के लिए साधू बन गए
सभी दोस्त आईआईटी का फॉर्म भर रहे थे इसलिए मुकुंदानंद ने भी एक्जाम दे दी। सिलेक्शन हो गया। पढ़ाई बहुत अच्छी चल रही थी। आईआईटी पास करने के बाद एमबीए करने आईआईएम गए। वे कहते हैं वहां साइकोलॉजी और ह्यूमेनिटीज संबंधित कई विषय थे। लेकिन मन के सवालों के जवाब नहीं मिल रहे थे। जैसे- मैं कौन हूं? मेरी विश्व के निर्माण में क्या भूमिका है? फिर उनकी मुलाकात एक आध्यात्म गुरु से हुई। उनका मानना था कि दुनिया को ऐसे भारतीय युवाओं की जरुरत है जो आध्यात्म के साइंस को समझ सकें। मुकुंदानंद कहते हैं, मैंने कॉरपोरेट हाउस की नौकरी के बजाए भगवान की नौकरी करने का फैसला किया। मानव मन की इंजीनियरिंग समझने के लिए मैं साधु बन गया। वे कहते हैं इंजीनियर और एमबीए कथा वाचक या संतों पर भरोसा नहीं करते हैं। चूंकि मैं खुद उन्हीं की तरह आईआईटियन हूं, लॉजिकल और सिस्टमेटिक तरीके से उन्हें समझा पाता हूं। मेरा आईआईटियन होना भी लोगों को आकर्षित करता है। लोगों को लगता है कि इंसान असफलता मिलने पर साधु बन जाता है। लेकिन उन्हें पता चलता है मैं वह सफलता छोड़ कर आया हूं। मुकुंदानंद को गूगल, ओरेकल, फॉर्चून, ड्यूक जैसी कंपनियां अपने यहां लेक्चर देने बुलाती हैं।
'आज मेरे आईआईटी के साथी मिलते हैं तो आध्यात्म समझना चाहते हैं। वे मानते हैं कि जीवन का लक्ष्य नहीं मिला।'
-स्वामी मुकुंदानंद
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