ओएनजीसी छोड़कर खेती संभाली
माधवन को बागवानी का बहुत शौक था। उनका बनाया गार्डन उनकी मां को भी बेहद पसंद था। लेकिन पिता नाराज रहते। उन्हें ये समय की बर्बादी लगती। वे चाहते थे कि माधवन इंजीनियर बनें। माधवन ने बीच का रास्ता निकाला। इंजीनियर तो बने लेकिन अपने ज्ञान का खेती में उपयोग किया। इंजीनियरिंग के बाद ओएनजीसी में नौकरी की। 14 दिन जमकर काम करते, फिर 15 दिन की छुट्टी लेकर खेती। नौ साल बाद जब कुछ पैसा जमा हो गया तो छह एकड़ जमीन खरीद ली। नौकरी छोड़ी और विशुद्ध रूप से किसान बन गए। माधवन कहते हैं 1989 में पहली फसल उगाई धान की। छह एकड़ में सिर्फ 2 टन धान निकला। भारी नुकसान हुआ। 1996 में मौका मिला इजरायल जाने का। वहां एनआरआई डॉ. लक्ष्मणन से मुलाकात हुई। उन्होंने खेती में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर काफी अच्छी फसलें पैदा की थीं। उन्होंने माधवन को भी ट्रेनिंग दी।अब वे अपने खेत में हर एकड़ के दस फीसदी हिस्से में नए प्रयोग करने लगे। जो वॉटर हार्वेस्टिंग सीखी थी, उसका इस्तेमाल करते। उनके खेती के तरीके इतने प्रभावशाली हुए कि राष्ट्रपति रहते डॉ. अब्दुल कलाम उनका खेत देखने आए थे।
'खेती में 80 फीसदी इस्तेमाल टेक्नोलॉजी का ही होता है। जिससे अनजान किसानों की ज्यादातर जमीन उपयोग ही नहीं हो पाती।'
-माधवन