देरी से मिला न्याय
2011 में संसद पर हमले के आरोपी अफजल को फांसी देने में सजा मिलने में 12 साल लगे। जबकि 2008 में मुंबई हमलों के आरोपी अजमल आमिर कसाब को चार साल बाद ही फांसी पर लटका दिया गया था। संसद पर हमले के शहीदों के परिजनों का कहना है कि उन्हें न्याय मिलने में काफी देर हुई। न्याय मिलने में हुई देरी के मामलों में कहा जाता रहा है कि देरी से मिला न्याय अन्याय के बराबर होता है। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने भी इसे देरी से मिला न्याय कहा है। अफजल को फांसी मिलने में देरी से नाराज होकर संसद हमले में मारे गए शहीदों के परिजनों ने अपने मेडल भी लौटा दिए थे। हालांकि शनिवार को अफजल को फांसी दिए जाने के बाद शहीदों के परिजनों ने टीवी पर आकर मेडल स्वीकार करने की बात कही है। हालांकि बलात्कार की तरह आतंक के मामलों में भी फास्ट्रटैक कोर्ट गठित करने के फैसलों का मानवाधिकारवादी विरोध करते हैं। इनका तर्क होता है कि आतंक के मामलों में सबूत ढूंढने की जरूररत होती है, जिसमें समय लगता है।