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फांसी, सज़ा, माफी- अदालत ही तय करे; राष्ट्रपति नहीं

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यही सही समय है संविधान के एक और संशोधन के लिए। राष्ट्रपति को माफी का अधिकार क्यों? इससे समाज का क्या भला? ये अधिकार तो अंग्रेजों ने बनाया था अपने लिए। ताकि खुद फंसें तो खुद को माफ कर लें। अब भारत जैसे बड़े गणतंत्र में ऐसे कानून की जरूरत नहीं है। इसे क्यों खारिज होना चाहिए? बता रही हैं विनीता पांडे..
 
बदलाव सब चाहते हैं
 
संवैधानिक अधिकार पर संशोधन लाने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। जनप्रतिनिधियों और न्यायपालिका दोनों को इस विषय पर एक राय बनाना होगी।
 
- अभिषेक मनु सिंघवी, कांग्रेस नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील
 
राष्ट्रपति सरकार की सिफारिश पर फैसले लेते हैं, इसलिए जिम्मेदारी सरकार की है कि वह मानक तय करे। यदि किसी अपराध को दुर्लभतम श्रेणी में रखा गया है तो अपराधी की दया याचिका पर भी उसी सतर्कता के साथ ध्यान दिया जाना चाहिए। 
 
- रविशंकर प्रसाद, भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील 
 
हमारे संविधान में कई प्रावधानों पर पुनर्विचार की जरूरत है। फिर भी यदि राष्ट्रपति के पास माफी का अधिकार है तो उन्हें  दुर्लभतम घोषित अपराधों के मामले में सख्ती बरतनी चाहिए। तभी समाज में सही संदेश जाएगा।
 
- मानिकराव गावित, पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री

 

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