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हैदराबाद से ही खरीदा विस्फोटक, धमाकों में पांच स्लीपर सेल का हाथ?

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घटना के बाद सरकार ने फिर देश भर में अलर्ट जारी कर दिया है। एनएसजी की टीम गुरुवार देर रात ही बीएसएफ के विमान से हैदराबाद पहुंच कर स्थिति को काबू में कर चुकी है। एनआईए की टीम भी हैदराबाद में है। गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक ब्लास्ट की जांच एनआईए को सौंपी जा सकती है। 
 
 
जांच एजेंसियों ने दिलसुखनगर के कोणार्क थिएटर और बस स्टैंड  के आसपास लगे सीसीटीवी में कैद फुटेज को अपने कब्जे में ले लिया है और उसकी गंभीरता से जांच की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक जांच एजेंसियों को सीसीटीवी से सुराग मिलने की उम्मीद है।  गृह सचिव आरके सिंह ने भास्कर से कहा कि यह उच्च क्षमता का ब्लास्ट था। खुफिया सूत्रों के मुताबिक पहले यह ब्लास्ट मोबाइल से करने की योजना थी, लेकिन बाद में साइकिल और टिफिन बॉक्स का इस्तेमाल किया गया। इसके पीछे यह शातिर दिमाग था कि मोबाइल विस्फोट से पहले कोई उठा सकता लेकिन खड़ी साइकिल पर किसी का ध्यान जल्दी नहीं जाता है। 
 
हैदराबाद के दिल चारमीनार से बमुश्किल चार किलोमीटर दूर दिलसुखनगर भीड़भाड़ वाला इलाका है। शाम जब दुकानों-दफ्तरों से लोग निकलते हैं तो एक मेला सा लग जाता है। खासकर बस स्टैंड जहां से लोग बस पकड़ते हैं। बस स्टैंड से मेन रोड के उस पार कोणार्क थियेटर समेत 3 बड़े थियेटर हैं। कोणार्क के सामने आनंद टिफिन सेंटर है। जहां युवाओं का जमावड़ा रहता है। शाम 6:58 बजे एक साइकिल पर रखे टिफिन बॉक्स में हुए धमाके ने आनंद टिफिन सेंटर को तबाह कर दिया। पूरा इलाका धुएं से भर गया। जमीन पर 40 से ज्यादा लोग पड़े थे। कई की सांसें बंद हो चुकी थीं। घायलों की चीख और धमाके से मची अफरातफरी से भगदड़ की स्थिति बन गई। लोग फुटओवर ब्रिज से बस स्टैंड की तरफ भागने लगे। तीन मिनट बाद ही ब्रिज के बस स्टैंड वाले छोर पर दूसरा धमाका हुआ। तीन की मौके पर ही मौत हो गई। 
 
एंबुलेंस का इंतज़ार नहीं करते हुए बस स्टैंड के कर्मचारी घायलों को एक सरकारी बस में भरने लगे। एक घंटे के भीतर ओस्मानिया और यशोदा मलकपेट हॉस्पिटल में 70 से ऊपर ज़ख्मी जमा हो चुके थे। अस्पताल में एक और आदमी ने दम तोड़ दिया। दो घंटे में 12 लोग मारे गए। हैदराबाद एक बार फिर आतंक के निशाने पर था। 2002 में दिलसुख नगर में हुए ब्लास्ट में दो लोग मरे थे। 2007 में भी इसी फुटओवर ब्रिज पर बम रखा था। वह फटा नहीं पर गोकुल चाट भंडार और लुंबिनी पार्क धमाकों में 42 लोगों की जानें गई थीं। इससे पहले सात महीने पहले 1 अगस्त 2012 को पुणे में सीरियल धमाके हुए थे। 
 
दिलसुख नगर ही क्यों? 
 
दिलसुख नगर हैदराबाद का बिजनेस हब जैसा है। यहां आईटी कंपनियों और निजी शिक्षा संस्थानों की भरमार है। देश के दूसरे हिस्सों से आए हुए छात्र इसी जगह पर रहते हैं। डेढ़ किलोमीटर के दायरे में 13 सिनेमा हॉल हैं। साथ ही एक बहुत व्यस्त बाजार है।  
 
 
 

 

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क्या रोका जा सकता था ये हमला? जब सरकार को थी पहले से इस हमले की जानकारी तो क्यों नहीं रोका इसे? कौन है असली जिम्मेदार? राज्य सरकार या केंद्र सरकार किसकी है लापरवाही?


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