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मजबूरी का मिलन? कल्याण सिंह और बीजेपी फिर आएंगे साथ-साथ

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नई दिल्ली. देश की राजनीति में बेहद अहमियत रखने वाले सूबे उत्तर प्रदेश में बीजेपी (गडकरी को दूसरे कार्यकाल पर हां, ना के बीच अधिसूचना जारी) ने एक बार फिर से अपने 'घर' को दुरुस्त करने की कोशिश शुरू कर दी है। इस कोशिश की पहली कड़ी के तौर पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की जनक्रांति पार्टी का बीजेपी में औपचारिक विलय हो जाएगा। इस मौके पर सांसदी बचाए रखने को पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह सोमवार को भाजपा में विधिवत शामिल होने का ऐलान नहीं करेंगे, लेकिन उनके पुत्र राजबीर सिंह व उनकी पत्नी प्रेमलता समर्थकों समेत भाजपाई हो जाएंगे। जनक्रांति पार्टी के विलय का कार्यक्रम बीजेपी के 'अटल शंखनाद रैली' के दौरान ही होगा। यह रैली झूलेलाल पार्क में होगी। रैली के मंच पर राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी, पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह और मुरली मनोहर जोशी समेत शीर्ष नेता जुटेंगे। इनके अलावा बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय कटियार, गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ के अलावा राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान सक्रिय रहे नेता भी इस रैली में शामिल होंगे। (नहीं चली आडवाणी की, गडकरी की दोबारा होगी ताजपोशी!)
 
 
उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे कल्याण सिंह से जब रविवार को यह पूछा गया कि बीजेपी की खोयी ताकत को वापस लाने का उपाय क्या उनके पास है, तो जवाब में कल्याण सिंह ने कहा, 'आप कल (21 जनवरी) का इंतजार कीजिए।' लेकिन क्या कल्याण सिंह के पास वाकई ऐसा कोई फॉर्मूला हो सकता है? शायद नहीं, क्योंकि एक समय सूबे के सबसे कद्दावर नेता रहे कल्याण सिंह खुद अपनी और अपने बेटे राजवीर सिंह के राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। 2009 में वे जैसे-तैसे एटा से लोकसभा सांसद चुने गए थे। लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का सियासी जहाज अपने गढ़ बुलंदशहर जिले में ही डूब गया था। उनकी जनक्रांति पार्टी (राष्ट्रवादी) का जिले में खाता तक नहीं खुल पाया था। जनक्रांति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कल्याण सिंह पुत्र राजवीर सिंह लगातार दूसरी बार गुड्डू पंडित के हाथों चुनाव हारे थे। सपा प्रत्याशी ने दूसरी बार राजवीर सिंह को उनके ही लोध वोट बैंक के गढ़ में धूल चटाई थी। विधानसभा चुनाव 2012 कल्याण सिंह के सियासी साख की 'अग्निपरीक्षा' मानी जा रही थी, जिसमें वे पूरी तरह से फेल हो गए थे। 
 
 
दरअसल, प्रदेश की ढाई सौ से अधिक विधानसभा सीटों पर कल्याण सिंह ने जनक्रांति पार्टी के बैनर के तहत प्रत्याशी खड़े किए थे। एक सौ से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में पूर्व मुख्यमंत्री हेलीकाप्टर से चुनाव प्रचार करने पहुंचे थे। कल्याण दावा कर रहे थे कि उत्तर प्रदेश में 2012 के चुनाव में 60 से अधिक और बुलंदशहर जिले की पांच सीटों पर काबिज होंगे। लेकिन कल्याण को चुनावों में जबर्दस्त नाकामी का सामना करना पड़ा। बुलंदशहर जिले की जिस सीट डिबाई से कल्याण खुद 1996 एवं 2002 में चुनाव जीते थे, विधानसभा चुनाव 2012 में दोनों गंवा बैठे। इसके अलावा जनक्रांति पार्टी को अनूपशहर सीट से भी उम्मीद थी। पूर्व विधायक और जनक्रांति पार्टी के  उम्मीदवार होशियार सिंह भी हार गए थे। बुलंदशहर, सिकंदराबाद, खुर्जा एवं शिकारपुर सीट पर तो जनक्रांति पार्टी की जमानत तक जब्त हो गई थी। कल्याण सिंह ओबीसी के तहत आने वाले लोध समुदाय से आते हैं। लेकिन २०१२ के चुनावों में कल्याण की पार्टी का जो हाल खुद उनके गढ़ माने जाने वाले बुलंदशहर में हुआ, उससे यह साफ है कि ओबीसी समाज की बात तो दूर कल्याण को लोध समाज का ही सबसे बड़ा नेता साबित करने में पसीने छूट जाएंगे। ऐेसे में कल्याण सिंह की वापसी के आसरे यूपी में बीजेपी का ओबीसी वोट को साधने का मंसूबा पूरा होगा, यह कहना बहुत मुश्किल है। यूपी में करीब 27.5 फीसदी वोटर पिछड़े वर्ग के तहत आते हैं।   
 
बीजेपी की क्या है मजबूरी है, आगे पढ़िए:
 
 
 
 
 
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