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टैम-ब्रैम इफेक्ट

 
Source: भास्कर   |   Last Updated 09:43(08/10/11)
 
 
 
 

 टैम-ब्रैम इफेक्ट

 

लालबहादुर शास्त्री का जयंती समारोह, संसद का केंद्रीय कक्ष, तमाम बड़े नेता, जाने-पहचाने चेहरे और फोटो खिंचवाने की रस्म। अमूमन यह पूरी तरह अ-राजनीतिक माहौल होता है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं था। वहां बाकी लोगों के अलावा सुब्रमण्यम स्वामी भी थे,जो इन दिनों 2जी घोटाले में चिदंबरम को नापने पर आमादा हैं और सोनिया गांधी व उनके दामाद रॉबर्ट बढेरा को लगातार निशाने पर लिए हुए हैं।

 

फोटो खिंचवाते समय उनके साथ खड़े थे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, और मनमोहन पर क्या बीत रही थी, ये आप फोटो देखें तो खुद समझ जाएंगे। स्वामी भी मनमोहन से नजरें न मिलाने के लिए लगातार सतर्क थे। वैसे आडवाणी से उनकी दुआ-सलाम हुई। हालांकि स्वामी यह भी मानते हैं कि उनकी भाजपा में वापसी में एकमात्र बाधा आडवाणी ही हैं। कुल मिलाकर सुब्रमण्यम स्वामी की मौजूदगी ने सारे माहौल को ऐसा बना दिया था, जैसे कोई युद्ध बस होने ही वाला हो। इसे कहते हैं टैम-ब्रैम इफेक्ट। यानी तमिल ब्राह्मण का दबदबा।

 

घूमे-फिरे और लौट आए

 

‘फॉरेन घूमना या घुमाना’ मजे होने की कोई गारंटी नहीं है। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) को देखिए। भाजपा की ज्यादातर राज्य सरकारें इसके लिए राजी नहीं हैं। राज्यों के वित्त मंत्रियों की एम्पावर्ड कमेटी के चेयरमैन असीम दासगुप्ता हुआ करते थे, लेकिन पश्चिम बंगाल में उनकी सरकार खेत रही। अब सुशील मोदी चेयरमैन बनाए गए हैं। केंद्र ने सोचा कि राज्यों के वित्त मंत्रियों को दुनिया में जीएसटी का जलवा दिखाया जाए, तो शायद कुछ असर पड़े। यूरोप का टूर रखा गया, लेकिन असर उल्टा हुआ। वित्त मंत्रियों ने फ्रांस का विश्लेषण कर डाला। कोई शक नहीं कि वहां जीएसटी है, लेकिन वर्ष 2011 में वहां विकास दर 2 फीसदी रहने की उम्मीद जताई जा रही है। फिर क्या था, जीएसटी का आइडिया फिर खारिज हो गया।

 

कलमाडी वाली वैल्थ

 

सुरेश कलमाडी की कॉमन वाली वैल्थ ने भाजपा में नई जान फूंक दी थी। इस वैल्थ की छपाई हुई थी राजधानी की एनडीएमसी इमारत में, जहां कॉमनवैल्थ गेम्स का मुख्यालय होता था। विडंबना देखिए कि हाल में जब भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई, तो इसी एनडीएमसी इमारत में। आइडिया था विधायक करण सिंह तंवर का। जाहिर है, इसे बैठक स्थल रखने को लेकर सवाल उठे और पार्टी के पास कोई जवाब नहीं था।

 

छोटे ठाकुर, बड़े ब्राह्मण

भाजपा में समय-समय पर ऐसे नेता होते रहे हैं, जो अपने सिद्धांतों के लिए राजनैतिक नुकसान भी झेलने को तैयार रहते हैं। हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांताकुमार की छवि भ्रष्टाचार और परिवारवाद के धुर विरोधी की रही है। इस बार जब उन्होंने फिर यह मुद्दा छेड़ा, तो निशाने पर आए मौजूदा मुख्यमंत्री प्रेमकुमार धूमल और उनके लोकसभा सांसद पुत्र अनुराग ठाकुर, जो युवा मोर्चा के अध्यक्ष भी हैं। लेकिन छोटे ठाकुर बीसीसीआई के संयुक्त सचिव भी चुन लिए गए और इससे शांताकुमार की मुहिम की हवा निकल गई। छोटे ठाकुर भी बाज नहीं आए। उन्होंने कहा कि मैं अपनी मेहनत के बूते यहां तक पहुंचा हूं।

 

वजनदार आइडिया

 

कांग्रेस प्रवक्ता रेणुका चौधरी कोई कम चौधरी नहीं हैं। एक स्ट्रोक में उन्होंने बाकी प्रवक्ताओं को टी-20 छाप मजा चखा दिया। मामला था नरेंद्र मोदी के तीन दिन के सद्भावना उपवास का। कांग्रेस रह-रहकर कोस रही थी, लेकिन मजा नहीं आ पा रहा था। मजा तब आया, जब रेणुका चौधरी ने कह दिया कि ये तो वजन घटाने का कार्यक्रम है। उनके शब्द थे- ‘ये अच्छा है, फास्ट पर जाओ, वजन घटाओ।’ रेणुका चौधरी को खुद भी इसकी जरूरत महसूस होती है। लेकिन क्या करें, कांग्रेस अभी उपवास पर बैठने के पक्ष में नहीं है।

 

सीमावर्ती मामला

 

अगर ऐसे ही चला, तो ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की लालू प्रसाद भी बन सकती हैं। सिक्किम में भूकंप आने के थोड़ी देर बाद संबोधित की गई प्रेस कांफ्रेंस में ममता जी कह गईं कि ‘सिक्किम में 20 पॉइंट (जो रिक्टर स्केल पर 6.8 पॉइंट था) हुआ है।’ और तो और, उन्होंने भूकंप की वजह भी बता मारी- ‘ये सब ग्लोबल अलार्मिग (यानी कि वार्मिग) की वजह से हुआ है।’ कहा जाता है कि जब लालूजी बिहार में विधायक होते थे, तब उन्होंने एक रेल दुर्घटना पर अफसोस जताया था, जिसमें उनके मुताबिक ‘करोड़ों लोग मारे गए थे’। पश्चिम बंगाल की सीमा बिहार से काफी मिलती है।

 

छोड़ो नीतीश की बातें

 

नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक से गैरहाजिरी की वजह नीतीश कुमार माने जाते है। लेकिन ऐसा है नही। असली वजह हैं संजय जोशी, जिनकी भाजपा में धमाकेदार वापसी हुई है। जोशी और मोदी कभी गहरे दोस्त थे, अब एक-दूसरे को जरा नही सुहाते। मोदी की समस्या यह भी है कि नितिन गडकरी ने जोशी की वापसी जैसा बड़ा फैसला करने के पहले उनसे पूछना तक जरूरी नहीं समझा। दरअसल गडकरी ने संघ के आला अधिकारियो के अलावा किसी से पूछना जरूरी नही समझा। बहरहाल, कार्यकारिणी बैठक के बाद आडवाणी से हुई लंबी टेलीफोन बातचीत में मोदी ने वादा किया कि फिलहाल वह जोशी मसले पर चुप रहेंगे।

 

आउट ऑफ कवरेज एरिया

 

ताकि सनद रहे, इसलिए बताना जरूरी है कि आडवाणी से मोदी की लंबी टेलीफोन बातचीत कार्यकारिणी बैठक के बाद हुई थी। बैठक के पहले तो भाजपा के लगभग सारे बड़े नेता टेलीफोन लाइन के एक तरफ तीन घंटे तक अटके रहे, लेकिन अमहदाबाद में मोदी लाइन पर ही नही आए।

 

कानूनी पंडितजी

 

2जी घोटाले में एक बड़े घराने को सीबीआई से क्लीनचिट क्या मिली, फंसे हुए ज्यादातर घराने कानूनी एकादशी का व्रत रखने के लिए तैयार हो गए हैं। लेकिन कमबख्त सीबीआई वजीर-ए-मामलात-ए-कानून की गुजारिश-सिफारिश कबूल ही नहीं कर रही है। घरानों की तमन्ना है कि वजीर न सही, अटॉर्नी जनरल ही उनके पुरोहित बन जाएं, लेकिन वो भी पहले ही हाथ जलाए बैठे हैं। अब बचे सॉलीसिटर जनरल, तो सारे कर्मकांड उन्हें ही करने पड़ रहे हैं।

पक्की नौकरी का सर्टिफिकेट

 

इन दिनों बड़े पदों की कई नौकरियां भी चुनावों की तरह हो गई हैं। पहले लंबी मतगणना का इंतजार और फिर कोर्ट के फैसले का लंबा इंतजार। उदय कुमार सिन्हा को सेबी का अध्यक्ष बनाने के खिलाफ एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर हो चुकी है। पैरवी कर रहे हैं पूर्व सॉलीसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यन। फैसला आ जाए, तब नौकरी पक्की मानी जाए।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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