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'मेरे शेर का सिर लाओ'

dainikbhaskar.com | Jan 10, 2013, 08:24AM IST

सीधी/मथुरा.  मध्य प्रदेश के सीधी जिले के डढिय़ा गांव में मातमी सन्नाटा है। गांव के सपूत लांस नायक सुधाकर सिंह की शहादत (हमारे जांबाजों का सिर ले जाने के लिए काले कपड़े में घात लगा कर बैठे थे दुश्‍मन सैनिक) पर गर्व तो है लेकिन गम भी है। पिता सच्चिदानंद सिंह को बेटे की शहादत की खबर बुधवार को मिली। गुरुवार को सैन्य सम्मान के साथ सुधाकर सिंह का अंतिम संस्कार कर दिया गया। 


वहीं, सुधाकर सिंह के साथ वीरगति को प्राप्त हुए मथुरा के कोसीकलां इलाके के गांव शेरगढ़ के रहने वाले लांसनायक हेमराज के गांव ने अपने शहीद को 'शेरगढ़ का शेर' नाम दिया है। कल से दहाड़े मारती मां मीना देवी बेटे का शव घर पहुंचते दहाड़ उठीं। पहले मेरे बेटे का सिर लाओ। सेना के जवानों ने हेमराज का शव चिता पर लिटाया तो गांव के बाकी लोग भी आगे आए और मीना देवी की आवाज बन गए-शहीद का सिर चाहिए। सेना ने शहीद हेमराज को सलामी दी। 5 साल के बेटे प्रिंस ने शहीद हेमराज को मुखाग्नि दी। (हाफिज सईद है भारतीय सैनिकों की मौत का जिम्मेदार!)



 
 
मंगलवार शाम से ही शोक के कोहरे में लिपटा कोसी कलां का पूरा इलाका बुधवार को क्रोध की ज्वाला में धधक रहा था। देर शाम उनका पार्थिव शरीर एक विशेष विमान से आगरा पहुंचा और वहां से सड़क मार्ग से उनके गांव तक ले जाया गया। तिरंगे में लिपटा शहीद हेमराज का शव जब गांव पहुंचा तो लोग 'शहीद हेमराज अमर रहे' के नारे लगाए। गर्व भी अपार था और गम अथाह। अपने वीर बेटे का अंतिम संस्कार कैसे कर दें? असमंजस में क्रोध और शोक के बीच का संतुलन खोज रहा था शेरगढ़। गांव पहुंचने पर गांववालों ने उनका अंतिम दर्शन कराने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन शव की हालत ठीक न होने से सैन्य अधिकारी ने बॉक्स खोलने की इजाजत नहीं दी। दो घंटे की कशमकश के बाद सभी मान गए ताकि शहीद के शव का अपमान न हो। अंतत: घुप्प अंधेरे में रात के नौ बजे शव को अग्नि को समर्पित कर दिया गया। मीना देवी को गर्व है कि उनका सपूत देश पर न्यौछावर हो गया, गम है बेटा खो देने का।
 
गांव शोक में है कि बहादुरी का उदाहरण बन गया हेमराज रहा नहीं, क्रोध पड़ोसी मुल्क के दैत्यों पर जो मानवीय मर्यादा भूल शहीद का सिर काट ले गए। शेरगढ़ सैनिकों का गढ़ है। पूर्व सैनिकों की तादाद भी बहुत है, ब्रजभूमि के अन्य गांवों की तरह। बुधवार को उनमें से बहुत हेमराज को श्रद्धांजलि देने आए थे। नम आंखों में ख़ून की डोरी साफ़ झलक रही थी। जुबान पर यही कि सरकार पूर्व सैनिकों को एक मौका दे, दुश्मन (दो जवानों के सिर काट ले गए पाकिस्तानी) से उसी भाषा में बात करने का जो वह बोलता है। 80 किलोमीटर दूर दिल्ली में राजनयिक और राजनीतिक स्तर पर भाषा में जो भी रोष हो, पर भारी गले से निकले शब्दों की ईमानदारी अलग होती है। 
 

(तस्वीर: शेरगढ़ में शहीद हेमराज का पार्थिव शरीर) 
 


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