साथी से कैसे नरेंद्र मोदी के दुश्मन नंबर 1 बन गए संजय जोशी, पूरी कहानी

नई दिल्ली। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस संजय जोशी को भाजपा से किनारेलगवा दिया, उनसे कभी उनकी अच्छी बनती थी। हालांकि दोनों के बीच मनमुटाव भी कम पुराना नहीं था। दोनों के बीच तकरार की नींव करीब 17 साल पहले ही पड़ गई थी।
वर्ष 1989-90 में संजय जोशी को आरएसएस ने गुजरात भेजा। संगठन को मजबूत करने के लिए उन्हें संगठन मंत्री के पद से नवाजा गया। मोदी संगठन महामंत्री के पद पर दो साल से काम कर रहे थे। दोनों ने मिलकर पार्टी को मजबूत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। नतीजा रहा कि भाजपा ने वर्ष 1995 में गुजरात में पहली बार सरकार बनाई।
लेकिन जब मुख्यमंत्री पद की दावेदारी की बात आई तो दो दूसरे ही नेताओं के नाम सामने आए। एक, भाजपा के राज्य में तब के सबसे वरिष्ठ नेता केशुभाई पटेल और दूसरा, शंकरसिंह वाघेला का। मोदी और जोशी ने मिलकर केशुभाई का साथ दिया तो वाघेला नाराज हो गए। इसके बाद वाघेला की बगावत हुई और समझौते के तौर पर केशुभाई की जगह सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री बनाया गया, जबकि नरेंद्र मोदी को दिल्ली भेज दिया गया। मोदी के जाने का सबसे अधिक फायदा जोशी को मिला। अब संगठन महामंत्री के पद पर जोशी की ताजपोशी हुई।
वर्ष 1998 में भाजपा एक बार फिर सत्ता में आ गई। मोदी गुजरात आना चाहते थे लेकिन जोशी इसके लिए तैयार नहीं थे। एक बार फिर केशुभाई मुख्यमंत्री के पद पर बैठे। लेकिन वर्ष 2001 में समीकरण बदल गया और उपचुनाव में भाजपा को हार को सामना करना पड़ा। नतीजा केशुभाई को हटाकर नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया गया। इसके बाद मोदी ने जोशी को दिल्ली की ओर रवाना करवा दिया (वह राष्ट्रीय संगठन महासचिव बने)। तब से दोनों की अदावत बढ़ती ही गई।
कौन हैं संजय जोशी
संघ के प्रचारक संजय जोशी 80 के दशक में नितिन गडकरी के साथ नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से देश की सेवा किया करते थे। उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और राजनीति में आने से पहले कुछ समय तक इंजीनियरिंग पढ़ाया भी है। नागपुर के रहने वाले संजय जोशी की भाजपा में बड़ी शुरुआत गुजरात से ही हुई थी। राज्य में तेरह बरस तक रह कर उन्होंने पार्टी को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। गुजरात से उनका करीबी रिश्ता रहा है। उनके परिवार के कई सदस्य गुजरात में ही रहते हैं।
अविवाहित संजय जोशी उस वक्त सबसे अधिक चर्चा में आए थे, जब वर्ष 2005 में उनकी एक फर्जी सीडी बाजार में आई थी। इस सीडी में उन्हें कथित तौर पर एक महिला के साथ आपत्तिजनक हालत में दिखाया गया था। इसके बाद पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। लेकिन सीडी फर्जी साबित हुई और जोशी की पार्टी में वापसी हुई। जोशी समर्थक मानते हैं कि सीडी के पीछे मोदी समर्थकों का हाथ था। सीडी कांड के बाद पार्टी में उनकी वापसी को लेकर भी कई नेता असहमत थे। लेकिन संघ और गडकरी के सामने उनकी एक भी नहीं चली।
नितिन गडकरी और संघ के करीबी रहने के कारण वर्ष 2012 में जोशी को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी गई। मोदी को यह भी पसंद नहीं आया। वह एक दिन भी चुनाव प्रचार के लिए यूपी नहीं गए।
जानकार मानते हैं कि नरेंद्र मोदी को यह अच्छी तरह पता है कि वर्ष 2013 में होने वाले विधान सभा चुनाव में उनकी राह में कई रोड़े हैं, जिनमें केशुभाई पटेल और जोशी प्रमुख हैं। यदि मोदी इस चुनाव को हारते हैं तो प्रधानमंत्री की कुर्सी से और दूर हो जाएंगे। संघ ने इस बात के पहले ही संकते दे दिए थे कि इस चुनाव में जोशी को एक बार फिर से गुजरात भेजा जा सकता है। ऐसे में यह चुनाव मोदी के लिए करो या मरो की स्थिति लेकर आएगा। ऐसे में मोदी अपने सभी 'दुश्मनों' को एक के बाद एक कर के निपटाने की नीति पर चल रहे हैं।
गोवर्धन झड़फिया ने कहा, संजय जोशी का स्वागत है
गुजरात में मोदी विरोधी नेता लामबंद हो रहे हैं। बीजेपी के पूर्व नेता और महागुजरात जनता पार्टी के अध्यक्ष गोवर्धन झड़फिया ने संजय जोशी का स्वागत करते हुए कहा है कि अगर वे उनके साथ आएं तो गुजरात बीजेपी टूट सकती है। इससे पहले केशुभाई पटेल, सुरेश भाई मेहता काशीराम राणा जैसे नेता साथ आ रहे हैं।









