नई दिल्ली। दिल्ली में गैंगरेप की घटना पर दुख जताते हुए चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर ने कहा है कि बलात्कार से लड़की की आत्मा मर जाती है। बुधवार को साकेत फास्ट ट्रैक कोर्ट का उद्घाटन करते हुए जस्टिस कबीर ने कहा, 'जब तक कोई बड़े हादसे नहीं होते, तब तक पुलिस की आंख नहीं खुलती है। यदि वाहनों से काले शीशे हटाए गए होते तो यह घटना नहीं होती।' हालांकि उन्होंने इस बात पर संतोष जाहिर किया कि दिल्ली में 16 दिसम्बर को हुई वारदात के बाद महिलाओं के खिलाफ अपराध पर लोग आवाज उठाने लगे हैं।
इस बीच, दिल्ली हाईकोर्ट ने इंडिया गेट और इसके आसपास निषेधाज्ञा लागू करने के खिलाफ जनहित याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा है। कोर्ट ने कहा है कि यदि इसी तरह धारा 144 लगाई जाती रही तो इस धारा का महत्व ही खत्म हो जाएगा। अदालत ने दिल्ली पुलिस से सवाल किया कि नई दिल्ली में बार-बार धारा 144 क्यों लागू की गई? इसके अलावा विरोध शांतिपूर्ण था तो कानून-व्यवस्था क्यों नहीं बनाई रखी गई?
चीफ जस्टिस डी मुरुगेसन और जस्टिस वी के जैन की बेंच ने कहा, 'संविधान के तहत घूमने-फिरने और बोलने की आजादी है। सीआरपीसी की धारा 144 का इस्तेमाल यूं ही नहीं करना चाहिए, नहीं तो इसका महत्व खत्म हो जाएगा।' कोर्ट की यह टिप्पणी दिल्ली के वकील आनंद कुमार मिश्रा की ओर से दायर पीआईएल पर आई है। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि राजधानी में सीआरपीसी के तहत उचित प्रक्रियाओं का पालन किए बिना मनमाने तरीके से निषेधाज्ञा लागू की जा रही है।
गैंगरेप पर सियासत भी तेज हो गई है। दिल्ली की कांग्रेसी मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने महिलाओं को सम्मान दिलाने के लिए
बुधवार को 'पीस मार्च' निकाल डाला। इसके कुछ ही देर बाद दिल्ली भाजपा ने दिवंगत पीडि़त को 'अशोक चक्र' देकर सम्मानित करने की मांग कर डाली। भाजपा से ही जुड़े संगठन एबीवीपी ने चार जनवरी को देश भर में दामिनी को इंसाफ दिलाने के लिए प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। एबीपीवी के महासचिव उमेश दत्त ने बताया कि इस प्रदर्शन में लोगों से अपील की जाएगी कि वे ज्यादा से ज्यादा संख्या में सड़कों पर उतरें और दामिनी को इंसाफ दिलवाएं।
इस बीच, 16 दिसंबर की घटना के बाद जान गंवाने वाली लड़की के घरवालों ने कहा है कि यदि उनकी बेटी का नाम उसके सम्मान के लिए सार्वजनिक किया जाता है तो किसी को कोई दिक्कत नहीं है। समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए छात्रा के पिता और भाई ने कहा कि है कि यदि सरकार बलात्कार विरोधी कानून के लिए उसका नाम इस्तेमान करना चाहती है और उसके नाम पर कानून बनाना चाहती है तो किसी को कोई दिक्कत नहीं है। यह तो सम्मान की बात है। नाम सार्वजनिक करने को लेकर केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री शशि थरूर ने बहस की शुरुआत की थी। उन्होंने मंगलवार को सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर इस बारे में राय जाहिर की थी।
थरूर की तरह कई लोगों का मानना है कि पीडि़ता का नाम छिपाए रखने से आखिर क्या हासिल हो रहा है? अब वह इस दुनिया नहीं रही। उसके घर, मोहल्ले सबमें उसकी पहचान जगजाहिर हो चुकी है। ऐसे में क्यों न उसे उस सम्मान से नवाजा जाए, जिसकी वह हकदार है (ब्यौरा आगे की स्लाइड पर क्लिक कर पढ़ें)।