रेप पीडि़ता की पहचान जगजाहिर करने को लेकर आईपीसी की धारा 228 ए में जिक्र है। इसके तहत बलात्कार पीडि़त की पहचान को सार्वजनिक करना गैरकानूनी है। लेकिन इस धारा में यह भी प्रावधान है कि अगर पीडि़त मर गई हो या वह अपनी पहचान सार्वजनिक करने की लिखित इजाजत दे चुकी हो या फिर मामले की सुनवाई कर रही अदालत ने ऐसा करने का आदेश दिया हो तो पहचान सार्वजनिक करना अपराध नहीं माना जाएगा।
आईपीसी की धारा 375 और 376 में शादी के बाद सेक्स का जिक्र है। इसमें कहा गया है कि अगर पत्नी 15 साल से कम उम्र की है तो उसके साथ बिना उसकी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाना रेप माना जाएगा। सरकार ने इस संबंध बिल का जो ताजा मसौदा पेश किया है, उसमें इस उम्र सीमा को एक साल बढ़ा भर दिया गया है। मूल रूप से पत्नी की मर्जी के बिना सेक्स के प्रति उसे सुरक्षा देने का कोई इंतजाम इस बिल में नहीं है। शादी के बाद रेप (पत्नी से) के मामले में इक्कीसवीं सदी की सोच इस बिल में कहीं नहीं झलकती है। यह तब हो रहा है कि जब दुनिया के सौ से अधिक देशों ने बीवी के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाने को अपराध माना है।
दिसंबर की शुरुआत में दिल्ली की एक अदालत ने भी साफ कर दिया था कि पत्नी के साथ जबरदस्ती सेक्स करना रेप नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि आईपीसी में वैवाहिक बलात्कार जैसा कोई मामला नहीं होता है। यदि शादी कानूनन सही है तो पत्नी से सेक्स (भले ही जबरन किया गया हो) रेप जैसा मामला नहीं है। पत्नी से रेप के आरोप में एक आरोपी को अदालत ने यह दलील देते हुए बरी कर दिया।
सरकार का नजरिया
जरा हमारी सरकार का नजरिया देखें। गृह मंत्रालय की नजर में किसी लड़की या महिला का पीछा करना और कपड़े उतारना यौन अपराध की श्रेणी में नहीं आते हैं। मंत्रालय का तर्क है कि इन्हें कोर्ट में परिभाषित करना और साबित करना कठिन होता है। इसलिए सरकार ने नए आपराधिक कानून संशोधन बिल-2012 में पीछा करने, कपड़े उतारने, नंगी परेड कराने और बाल मुंडवाने को यौन अपराध की अलग श्रेणी में नहीं रखने का फैसला किया है
(पढ़ें : महिलाओं को नंगा करना यौन अपराध नहीं!
)। दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद भी सरकार की ओर से कई घोषणाएं की गईं, लेकिन इन पर अमल शून्य रहा। महिलाओं की सहायता के लिए शुरू की गई हेल्पलाइन तक ठीक से काम नहीं कर पाई। बसों में होमगार्ड के जवान बैठाने का फैसला भी ढाक के तीन पात जैसा रहा। जिस सरकार पर सिस्टम दुरुस्त करने की जिम्मेदारी है, उसी की मुखिया (शीला दीक्षित) ने महिलाओं का सम्मान सुनिश्चित कराने के लिए मोर्चा निकाला।