अस्पताल : जिंदगी देने वाली जगह बनी नरक
हिंदुस्तान के किसी भी अस्पताल में चले जाएं, खासतौर से सरकारी अस्पतालों में, यहां न सिर्फ नर्स बल्कि डॉक्टर भी असंवेदनहीनता की चादर ओढ़े नजर आते हैं। मरीजों और उनके परिजनों के साथ गाली गलौज इन अस्पतालों में आम बात है। यदि कोई रेप पीडि़ता इन अस्पतालों में पहुंच जाती है तो यह अस्पताल के लिए चर्चा का विषय बन जाता है।
जरा दामिनी के दोस्त की जुबानी सुनिए, दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल की दास्तानं। पुलिस ने हमें सफदरगंज अस्पताल पहुंचाया। वहां भी किसी ने मदद नहीं की। किसी ने कंबल तक नहीं दिया। सफाईवाले से मदद मांगी। कहा पर्दा ही दे दो। ठंड लग रही है। लेकिन किसी ने नहीं दिया। मेरे हाथ-पैर से खून बह रहा था। मैं हाथ भी नहीं उठा पा रहा था। पैर में फ्रेक्चर था।
आज भी बलात्कार की शिकार पीडि़त का मेडिकल उसके गुप्त अंग में अंगुली डालकर किया जाता है। रेप टेस्ट की एक समस्या यह भी है कि यह निर्धारित नहीं है कि डॉक्टर को क्या जांच करनी है और क्या नहीं करनी है। कई मामलों में डॉक्टर सिर्फ अपनी राय एक कागज पर लिखकर पुलिस स्टेशन भेज देता है।
रेप टेस्ट के लिए निर्धारित पैमानों की अस्पष्टता का पता इस बात से भी चलता है कि रेप टेस्ट के दौरान डॉक्टरों को महिला की तंदुरुस्ती के बारे में भी राय देनी होती थी ताकि यह स्थापित किया जा सके की महिला अपना बचाव करने में सक्षम थी या नहीं। कई केस में देखने को आया है कि मेडिकल करने वाली डॉक्टर ही पीडि़त के साथ बदसलूकी करने लगता है।