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नंबरों का दरिया है...

dainik bhaskar.com | Dec 17, 2012, 11:11AM IST
नंबरों का दरिया है...
संसद को "नंबर गेम" करार देने वाले माननीयों और शपथशुदाओं की कमी नहीं है। मौजूदा संसद के मौजूदा गेम को"माया-मुलायम गेम" करार देने वाले पूर्ण और अपेक्षाकृत कम पूर्ण माननीयों और गैर-शपथशुदाओं की भी कमी नहींहै। इस बार जो नजारा दिखा है, उससे सिद्ध होता है कि या तो "माया में ही नंबर है, या नंबर में ही माया है। या नंबर की ही माया है, या माया का ही नंबर है।" हमारा इरादा कोई पुरानी कविता टीपकर नई लिखने का कतई नहीं था, लेकिन क्या करें सिचुएशन ही ऐसी थी। लोकसभा में संदीप दीक्षित कागज पेंसिल लेकर तमाम सत्तापक्षीय माननीयों को गिन रहे थे और गिनती संसदीय कार्य राज्यमंत्री राजीव शुक्ला से चैक करा रहे थे। राजीव शुक्ला फिर तमाम नंबरों को, मतलब माननीयों को, फोन करवा रहे थे। और यह सब तब हो रहा था, जब स्क्रिप्ट माया के पास भी पहुंच चुकी थी और मुलायम के पास भी। किसी पुराने टाइप के शायर ने शायद कहा भी था "ये एफडीआई नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे। एक नंबरों का दरिया है, और गिन-गिन कर जाना है।" ये ही कहा था न?
 
 
 
रॉन्ग वाला नंबरवा 
 
नंबरों का एक विकट रूप होता है। इसे "रॉन्ग-नंबर" कहते हैं। नंबरों की जुगाड़ करनी पड़ती है, रॉन्ग नंबर कहीं भी, कभी भी स्वयं प्रकट हो जाते हैं। नंबरों की गिनती करनी पड़ती है, रॉन्ग नंबर गिनती की मोहमाया में नहीं पड़ते। इस बार जब लोकसभा में नंबर युद्ध, यानी बहस चल रही थी, तो लालू प्रसाद ने मुरली मनोहर जोशी को चुनौती दी कि वे अपनी घड़ी दिखाएं। भई बड़े नेता हैं, तो घड़ी भी बड़े ब्रांड की इंपोर्टेड ही होगी लेकिन लालूजी रॉन्ग नंबर लगा बैठे थे। जोशीजी की घड़ी खालिस देसी निकली। जवाब में लालू ने कहा कि उनके पास न घड़ी है, न मोबाइल। 
 
 
अगोचर नंबरपति 
 
कलियुग है। इसमें कभी-कभी ऐसा भी होता है, जब नंबरों को रॉन्ग नंबर की तरह स्वयं खुलकर प्रकट होना पड़ जाता है। सिर्फ दोहरी बातों से काम नहीं चलता। जैसा मायावती के साथ राज्यसभा में हुआ था। उसके पहले विपक्ष अगोचर नंबरों से, यानी निर्दलीय माननीयों, मनोनीत माननीयों और तटस्थ माननीयों से संपर्क कर चुका था। कहा जाता है कि खुद पीएम ने भी उन मनोनीत माननीयों को फोन किया था, जो जाने-माने उद्योगपति हैं। जब मायावती ने अपना नंबर स्वरूप दिखा दिया, तो सारे अगोचर माननीयों की हिम्मत पस्त पड़ गई। सिर्फ एक उद्योगपति ने कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया। जानते हैं कौन-अजय संचेती, जो भाजपा के तो हैं हीं, गडकरी के निजी मित्र भी हैं।
 
 
दोबारा मत कहना
 
पुनश्च, कलियुग है। इसमें कभी-कभी गैर-माननीय नंबर भी चर्चायोग्य अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे कि 6, 12 और 24। ये वे अमाननीय नंबर हैं, जो किसी बहुमत-अल्पमत के काम के नहीं थे, फिर भी इनकी चर्चा माननीयों को करनी  पड़ी। हरियाणा में कांग्रेस के स्थानीय युवराज (सीएम पुत्र दीपेंद्र हुड्डा) ने लोकसभा में कहा कि हमारे किसान 6 और 12 इंच के आलू  तो क्या 24 इंच का आलू भी उगा सकते हैं। अपने तर्क के पक्ष में उन्होंने स्वयं किसान पुत्र होने की भी दलील दी। 6-12 का 24 करना राजनीति में भले ही संभव हो, आलू में संभव नहीं होता, ऐसा जरूर लौकी के मामले में रहा  होगा। ऐसा कहकर सुषमा स्वराज ने किसानपुत्र युवराज के खेती ज्ञान पर सवाल खड़ा कर दिया। 
 
 
जो हुकुम, मेरे नंबर
 
आपको पता है, माननीयों में से कुछ अतिमाननीय भी होते हैं। लगभग मान्यवर टाइप के। अब देखिए, राज्यसभा में जब माननीय मायावतीजी अपने उच्च विचार व्यक्त कर रही थीं, तो उनकी पार्टी के कुछ माननीय सदस्य अपनी माननीय नेता के लिए पानी आदि लाने का कार्य कर रहे थे। हालांकि सदन में सदस्यों को पानी पिलाने के लिए गैर माननीय स्टाफ वगैरह होता है। किसी कविहृदय माननीय ने बाद में गुनगुनाते हुए कहा- "कौन कहता है हर नेता तिवारी नहीं हो सकता, एक गिलास तो तबियत से उठा लाओ यारो।" आमीन। 
 
 
 
 जस सत्ता परिवर्तन, तस हृदय परिवर्तन
 
 क्या आप बता सकते हैं कि "माया" का भी बॉस कौन हो सकता है? सारे ग्रंथ खोज डाले, "माया महाठगनी हम जानी." से ज्यादा कुछ मिला ही नहीं। अचानक एक दिन पता चला कि सत्ता "माया" की भी बॉस होती है। हुआ यूं कि इस बार दिल्ली में कॉन्स्टीट्यूशन क्लब नामक सरकारी परिसर में बहनजी की प्रेस कांफ्रेंस हुई। वैसे दिल्ली में बहनजी की प्रेस कांफ्रेंस हमेशा फाइवस्टार होटलों में होती हैं। ये उसूल का मामला रहा है। लेकिन इस बार हृदय परिवर्तन हो गया। वजह? पूछने पर किसी ने हमें बताया कि ये यूपी वाले नंबरगेम का प्रताप है। "सत्ता महाठगनी हम जानी।" 
 
 
होते तो क्या बिगाड़ लेते?
 
गुरुदास दासगुप्ता का गला ठीक नहीं था। जब भाषण दे रहे थे, तो उन्हें पीने के लिए पानी की नहीं, खांसी के सीरप की जरूरत थी। लिहाजा दवा की शीशी खुद अपने साथ लेकर आए थे। कितनी अच्छी बात है कि गुरुदास दासगुप्ता न कांग्रेस में हैं, न बीएसपी में। वैसे होते भी, तो क्या बिगाड़ लेते? बड़े से बड़ा तिवारी भी अपने बॉस के लिए जेब में खांसी का सीरप लेकर नहीं चल सकता, और दासगुप्ता वैसे भी किसी के बॉस नहीं हैं।
 
 
सब पॉलिटिक्स है
 
 
एक मजेदार बात है। बॉलीवुड का हीरो फिल्मों में भोजपुरी बोलता है, लेकिन मुंबई में बिहार के लोगों के खिलाफ जमकर नेतागीरी होती है। मार्केट और पॉलिटिक्स का घालमेल जो कराए, सो कम है। अब एक तरह से देखा  जाए तो एफडीआई मसला भी मार्केट और पॉलिटिक्स का घालमेल ही है। लिहाजा ये भी जो कराए, सो कम है। भाषण देते समय तमाम माननीयों ने जमकर हिंदी बघारी। दक्षिण वालों ने भी। ताकि हे दुकानदार, तू अच्छी तरह समझ ले, शुद्ध हिंदी में कि हम तेरे हक के लिए किस हद तक लड़े हैं। मजेदार बात ये हुई कि आंध्र के एक माननीय जब कपिल सिबल को "लॉयर" यानी वकील कहना चाह रहे थे, तो "लायर" यानी झूठा सुनाई दे रहा था। इस पर विपक्ष वाले माननीयों ने मेजें थपथपाईं, तो मैं क्या करूं। 
 
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