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अब कौन होगा संकटमोचक?

डॉ. भारत अग्रवाल | Jul 28, 2012, 14:49PM IST
 
 

असम फॉर्मूला
जहां तक हमें याद है, असम में एक बार प्रणबदा ने जवानों के बीच तब तक शुद्ध हिंदी में जोरदार भाषण देकर सबको हैरान कर दिया था, जब तक बात 'भारत माता की जय' पर नहीं पहुंच गई थी। दादा ने जैसे ही कहा- 'मेरे साथ गोला मिलाकर बोलिए... भारोत माता की जोय', वैसे ही शायद अंग्रेजी लिपि में लिखे हुए हिंदी भाषण का भेद खुल गया था। अब कम से कम उपराष्ट्रपति चुनाव का फैसला आने तक दादा को वही फॉर्मूला अपनाना पड़ेगा। वजह यह है कि परंपरा के अनुसार संसद के केंद्रीय कक्ष में राष्ट्रपति के भाषण के पहले और अंतिम पैरा का अनुवाद उपराष्ट्रपति करते हैं। अब यहां राममिलाई... ये कि दादा हिंदी बोलने में सहज नहीं हैं और वाइस प्रेसिडेंट हामिद अंसारी साब को तो शायद हिंदी पढऩे में भी दिक्कत आती है। असम वाले फॉर्मूले, एक तेरा ही सहारा।


अब कौन होगा संकटमोचक?

असम वाला ही नहीं, दादा तमाम फॉर्मूलों को अपने साथ ले गए हैं और कम से कम फिलहाल तो कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार फॉर्मूलाविहीन नजर आ रही है। कहा जा रहा है कि संकटमोचक तो राष्ट्रपति भवन चले गए, लेकिन संकटों को अकबर रोड, जनपथ, राजपथ और रेसकोर्स की सड़कों पर छोड़ गए। पवार संकट, वाइस प्रेसिडेंट संकट और अभी लेटेस्ट वाला डीएमके संकट। वर्ष 2014 तक कुल कितने संकट हो जाएंगे? ये गिनती करना एक और संकट है।


ओ मेरे बंधु रे...

रक्षाबंधनका त्यौहार आने वाला है और (अविभाजित) बंगाल में इसी रक्षाबंधन ने कोई एक शताब्दी पहले अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। हम यह नहीं कह रहे कि दादा और ममता दीदी में कोई रक्षाबंधन वाले संबंध हैं, लेकिन मौका आने पर सारा बंगाल जैसे एकजुट हुआ, उससे रक्षाबंधन आंदोलन जरूर याद आ गया। दीदी ने वोट दिया और दिलवाया, दादा भावुक हुए, दीदी भावुक हुईं, दादा ने विशेष विमान कोलकाता भिजवाया, दीदी दिल्ली आईं, शपथग्रहण के एक दिन पहले घर पर मिलकर गईं और सारे गिले-शिकवे दूर हो गए। जानते हैं उस विशेष विमान से कौन आया था? फिल्म स्टार मिथुन चक्रवर्ती। यानी अपने मिठुन दादा।

खफा हैं संगमा
दादा अब राष्ट्रपति हैं और हम सबके परममान्य हैं। लेकिन उनके महामहिम बनने के पहले तक जो तमाम सवाल, विवाद और शिकायतें खड़ी हुई थीं, वे अब भी अधर में हैं। ठीक से नहीं पता कि उन शिकायतों की अब कानूनी हैसियत क्या होगी। लेकिन खबर यह है कि पीए संगमा और उनके चुनाव एजेंट रहे चंडीगढ़ के वकील सतपाल जैन अभी भी दादा को बख्शने के लिए तैयार नहीं हैं। मामला अदालत में जाएगा, पूरी संभावना है।


महामहिम प्रणबदा
महाराष्ट्र के वोटों की गिनती खत्म होने तक दादा का चुनावी बेड़ा पार लग चुका था। तुरंत खबर सारे बड़े नेताओं को भिजवाई गई। प्रणबदा उस समय अपने घर पर थे। पहला फोन प्रधानमंत्री का आया। मनमोहन सिंह ने प्रणबदा को इस बार 'सर' न कहकर सीधे 'मिस्टर प्रेसिडेंट' कहकर संबोधित किया। शाम को सोनिया गांधी प्रणबदा से मिलने उनके निवास पर गईं, तो उन्होंने भी प्रणबदा को 'महामहिम' कहा। अपन भी सोच रहे हैं कि अब प्रणबदा को प्रणबदा कहना बंद कर दें।


अंदर की बात
खुदा हमसे अंदर की बात न कहलवाए। प्योर बाहर की बात यह है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले कुछ हफ्तों से गाहे-बगाहे भाजपा पर एक न एक तीर छोड़ देते थे। ये सिलसिला कैसे टूटा, वो अलग बात है, लेकिन उसमें भी बाहर की बात ये है कि एक तो भाजपा वाले उस तीर को लिफ्ट नहीं दे रहे थे और दूसरे, शरद यादव जवाबी तीर चलाने लगे थे। चलिए आपको लगे हाथ एक अंदर की बात बता देते हैं। अंदर की बात यह है कि नीतीश कुमार का भाजपा पर हमला हमेशा सोमवार को होता था। सोमवार समझते हैं न आप? वो ही, संडे की रात का अगला वाला दिन। लेकिन इसका संडे से संबंध हम नहीं बताएंगे। वह जरा अंदर की बात है न!



हेल्थ मिनिस्टर चिदंबरम!
हाल ही में उत्तरी क्षेत्र परिषद की मीटिंग चंडीगढ़ में संपन्न हुई। तमाम मिनिस्टरान ने उसमें शिरकत फरमाई। शिरकत के बाद प्रेस से गुफ्तगू फरमाने का मौका आया। पहले गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने कुछ फरमाया और फिर माइक अंबिका सोनी के हवाले कर दिया। अंबिका सोनी ने एक बार नहीं, पूरे तीन बार चिदंबरम को हेल्थ मिनिस्टर कह दिया। मिनिस्ट्री सचमुच डांवाडोल है। फेरबदल कभी भी हो सकता है। अंबिका सोनी सूचना मंत्री हैं और अपन तो यही सोच रहे हैं कि सोचो उनके मुख से ऐसे बोल सुनकर चिदंबरमजी पर क्या बीत रही होगी।


आगामी आकर्षण
इंटरनेट का जमाना इस कदर आ गया है कि अब समाजवाद भी इंटरनेट के जरिए आ सकता है। कोशिश कर रहे हैं अखिलेश यादव। एक वेबसाइट बन रही है- अखिलेशयादव डॉट कॉम। इसी तरह एक और वेबसाइट बन रही है- अरुणजेटली डॉट कॉम। फिलहाल दोनों वेबसाइट्स पर दोनों नेताओं के फोटो हैं और यह मैसेज है कि वेबसाइट जल्द आने वाली है।


बिना टीए-डीए का वोट
वैसे राष्ट्रपति का चुनाव कुछ सांसदों को अखर गया। सारे सांसदों को वोट डालने के लिए दिल्ली आना पड़ा। अकेले वोट डालने के लिए आने पर टीए-डीए नहीं मिलता। लिहाजा लगे हाथ संसदीय समिति की मीटिंग भी रखवा लेने का अनुरोध किया गया। लेकिन यहां संकट खड़ा हो गया। संसद में इतने कमरे नहीं हैं कि सारी समितियों की मीटिंग एक साथ हो सके।


bharat@bhaskarnet.com
 
 
 

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