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इशारों को अगर समझो

डॉ. भारत अग्रवाल | May 05, 2012, 11:18AM IST
 
 

रेखा को राज्यसभा मेंबर बनाने की खबर पर मायावती ने एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि कांग्रेस ने ऐसा क्यों किया, यह वह अच्छी तरह जानती हैं। जो बात मायावती जानती हैं, आप समझ जाते हैं, सोशल मीडिया को उससे मतलब तक नहीं है। जैसे ट्विटर इसी बात पर अटका रहा कि 'एक तरफ है घर वाली और एक तरफ हाउस वाली' या यह कि 'जो काम मनमोहन सिंह ने कर दिखाया, अमिताभ नहीं कर सके'। बात गंभीर है। इतनी संगीन पॉलिटिक्स चल रही है। २०१४ में चुनाव हैं और सोशल मीडिया अगर इसी तरह जया, रेखा, हेमा, सुषमा करता रहा तो मायावती की बात समझने की जहमत कौन उठाएगा?

सारे ऐसे ही हैं

यही हाल अभिषेक मनु सिंघवी का है। मामला कितना गंभीर था या नहीं था, कैसे उन्हें संसदीय समिति की चेयरमैनी से इस्तीफा देना पड़ा, कैसे इसे टालने के लिए पूरी ताकत लगाई गई, कैसे मामला पैदा हुआ और कैसे खत्म हुआ या कराया गया- सारे सवाल भूलकर, सारे मामले को, सारे लोगों ने, सारे सोशल मीडिया में सारे संभव चुटकुलों से जोड़ डाला। चुटकुले अब सीरियस पॉलिटिक्स की जगह लेते जा रहे हैं। सारी बात यही है।

सीरियस बात

अपन इस चुटकुलेबाजी में क्यों फंसें? अपन सीरियस बात करते हैं। उतनी सीरियस, जितने मनमोहन सिंहजी तब लगते हैं, जब वो खुशी से मुस्करा रहे होते हैं। जैसे जब राज्यसभा में नए मेंबर शपथ ले रहे थे, तो शपथ लेने के बाद वो पीएम को नमस्ते करते थे और जवाब में पीएम मुस्करा देते थे। लेकिन जब भाजपा के अजय संचेती ने शपथ लेने के बाद पीएम की तरफ देखकर नमस्ते की, तो पीएम दूसरी तरफ देखने लगे। मामला ज्यादा ही सीरियस है।

वो बात, जो हुई नहीं

अब आपको एक वो सीरियस बात बताते हैं, जो हुई ही नहीं। बात क्या थी, ये तो हमें भी नहीं पता, पर हुई क्यों नहीं, ये जरूर पता है। जब आसिफ अली जरदारी पीएम हाउस में लंच के मेहमान थे, तो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के युवराज बिलावल भुट्टो जरदारी और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को एक साथ बैठाया गया था। लेकिन खाना इतनी जल्दबाजी में खाना पड़ा (यहां तक कि कॉफी और मिठाई एक साथ परोस दी गई) कि दोनों युवराजों में बात ही नहीं हो पाई। इस कोलावेरी डी की वजह ये थी कि जरदारी को लेकर जाने वाला हैलिकॉप्टर रात में उतर नहीं सकता था और देर हो रही थी। वैसे बात हुई होती, तो शर्तिया बेहद सीरियस रही होती। सीधे बाउंड्री पार।

क्या बात हुई?

अब एक बात देखिए। सीरियस है या नहीं, आप बताइए। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक हाल ही में नरेंद्र मोदी से बात करते देखे गए। हालांकि पटनायक को सेक्युलर नजर आने के लिए नीतीश कुमार के लेवल पर जाने की जरूरत कभी महसूस नहीं होती, फिर भी बात तो बात ही है। अब मोदी खेमा इसके अपने मतलब निकाल रहा है और पटनायक खेमा कह रहा है कि ये कोई खास बात नहीं थी। सीरियस प्रॉब्लम है।

मुलाकात कम, कवरेज ज्यादा

ममता को लेकर कांग्रेस का डर वाजिब भी है। हमें तो शक है कि इस बार दिल्ली की चार दिन की यात्रा में ममता का कोई बखेड़ा खड़ा न करना भी शायद कोई मैसेज दे रहा है। ममता शांति की मूर्ति बनी रहीं। लेकिन सब पॉलिटिक्स है। चार दिन में ममता चार वीआईपी लोगों से मिलीं, लेकिन एक दिन में सिर्फ एक से। एक तो कवरेज ज्यादा मिलता है, दूसरे छाछ भी फूंक-फूंककर पी जा रही है। कौन जाने आगे क्या हो?

छोटे वाले महामहिम!

बहरहाल प्रतिभा पाटील की तो विदाई होने जा रही है। लेकिन गुजरात कैडर के उनके सेक्रेटरी डॉ. किस्टी एल. फर्नांडीज छोटे वाले महामहिम बन सकते हैं। जैसे कि अंडमान-निकोबार के लेफ्टिनेंट गर्वनर वगैरह।

कांटा कटा सिब्बल का!

एसएस अहलूवालिया चुनाव हार गए। बीजेपी में भी कुछ लोग खुश हुए, लेकिन खुशी संभाली नहीं जा रही है तो अपने कपिल सिब्बल से। सिब्बल को लगता है कि उनके तमाम बिल जो अटके हुए थे, तो सिर्फ अहलूवालिया के कारण। लेकिन इस सच के दो-चार पहलू और भी हैं। समय पर सामने आएंगे। बहरहाल, निष्कर्ष ये है कि सिब्बल साब को कोई गलतफहमी है। सीरियस टाइप की।

बुजुर्गों की सहूलियत

अब सीनियर सिटीजंस के मामलों को हर लेवल पर कोर्ट में प्राथमिकता मिलेगी। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में हुआ है।

इस बार सीबीआई से भी

८२ बैच के आईएएस अधिकारी, जो अभी संयुक्त सचिव स्तर पर भारत सरकार की सेवा कर रहे हैं, उनको तरक्की देकर अतिरिक्त सचिव बनाने के लिए सीवीसी से क्लीयरेंस लेने की परंपरा रही है। लेकिन इस बार सीबीआई से भी क्लीयरेंस मांगी गई है।

एक ही इनिंग?

दो चेयरमैन हैं। एक प्रोजेक्ट इक्विपमेंट कॉर्पोरेशन के एक और इंस्ट्रूमेंटेशन लिमिटेड के। दोनों को एक्सटेंशन नहीं मिल पा रहा है। एक की उपलब्धियों में दाल घोटाला है और दूसरे की उपलब्धियां एक खुफिया एजेंसी को पता चल गई हैं। बहुत नाइंसाफी है।
 
 
 

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