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चिंतनयोग्य सवाल

डॉ. भारत अग्रवाल | Jan 28, 2013, 17:42PM IST
चिंतनयोग्य सवाल

इस देश के दो प्रसिद्ध नारे हैं- ‘.. आप संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।’ और  दूसरा नारा है- ‘.. आप आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं’। दोनों में क्या अंतर है? अंतर यह है कि एक में कवि ‘संघर्ष’ करने की स्थिति में साथ निभाने की बात कहता है और दूसरे में वह ‘आगे बढ़ने’ की स्थिति में साथ निभाने की बात कहता है, जिसे पोस्ट और पोस्टिंग वगैरह कहा जाता है। जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में जब राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाने का ऐलान किया गया, तो नारा लगा- ‘राहुलजी आप संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।’ आखिरकार एक वरिष्ठ नेता को टोकना पड़ा- सारा संघर्ष राहुलजी करेंगे, तो आप क्या करोगे? यह सचमुच चिंतनयोग्य सवाल था।


 




टैलेंट हंट


 




सुशील कुमार शिंदे की निजी तौर पर कोई गलती नहीं है। होम मिनिस्ट्री ज्यादातर बार काजल की कोठरी ही रही है। लेकिन हर होम मिनिस्टर यह साबित करने की कोशिश जरूर करता है कि कोठरी की कोई गलती नहीं है और जो भी कालिख है, वह तो उसका निजी टैलेंट है। शिंदे संघ और भाजपा को आतंकवाद से जोड़कर दिल्ली से दौलताबाद तक पहुंचे ही थे कि अपने उच्च विचारों को अखबारों की खबरों पर आधारित होने की बात कहकर उन्होंने वापस दिल्ली जाने का ऐलान कर दिया। आरएसएस हैरान था। आखिर इतने टैलेंटेड मिनिस्टर की बात का क्या जवाब दें? जब राम माधव को कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने कहा कि शिंदेजी को मंत्रालय छोड़कर न्यूज रीडर बन जाना चाहिए।


 



जलवे उपाध्यक्ष के




एक तो भाजपा वालों ने न कोई चिंतन किया है, न शिविर लगाया है। दूसरे, भाजपा में न जाने कितने उपाध्यक्ष होते हैं। तीसरे, वहां अध्यक्ष के बाद असली ताकत महासचिव के हाथों में होती है। शायद इन्हीं कारणों से भाजपा वाले राहुल गांधी के कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने पर हो रहे शोरशराबे को अपने तौर पर नहीं समझ पा रहे हैं। इस पर एक बुजुर्ग कांग्रेस नेता ने बताया कि जब अजरुन सिंह कांग्रेस के उपाध्यक्ष होते थे, तब कमलापति त्रिपाठी भी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष होते थे। जब अजरुन सिंह किसी राज्य का दौरा करते थे, तो सैकड़ों कारें उन्हें लेने हवाई अड्डे पहुंच जाती थीं, जबकि  कमलापति त्रिपाठी जब कहीं जाते थे, तो उन्हीं की कही बात के मुताबिक उन्हें अपने लिए टैक्सी करनी पड़ती थी। इसे कहते हैं कांग्रेस उपाध्यक्ष का जलवा। भाजपा इसे समझ नहीं पा रही है।


 




कभी आसमानी-कभी सुल्तानी


 




नरेंद्र मोदी दिल्ली आकर राजनाथ सिंह से सवा दो घंटे तक मिल लिए, गले मिलने की और प्रेम-सद्भाव दिखाने की रस्में हुईं और खूब सारी पॉलिटिक्स हुई। उर्दू जुबान में इसे ‘सुल्तानी सियासत’ कहते हैं। लेकिन इस सुल्तानी सियासत का रास्ता कैसे साफ हुआ और उसमें वो सियासत कैसे चली, जो सुल्तानी कम और आसमानी ज्यादा नजर आती है? हम आपको बताते हैं। गौर से देखिए। गडकरी का दोबारा अध्यक्ष बनना बिल्कुल तय है। मोहन भागवत से लेकर सारे सुल्तान फैसला कर चुके हैं, पार्टी का संविधान तक बदला जा चुका है। लेकिन कुछ सुल्तान, जैसे कि यशवंत सिन्हा विरोध कर रहे हैं। यशवंत सिन्हा फॉर्म मंगाते हैं। अब यहां से आसमानी सियासत शुरु होती है। रात में गडकरी दोबारा चुनाव न लड़ने का ऐलान करते हैं, फैसला राजनाथ सिंह के पक्ष में होता है। लेकिन चुनाव जिस दिन होना है, उसी दिन परेड का फुल ड्रेस रिहर्सल है और भाजपा का ऑफिस इंडिया गेट के बिल्कुल पास है। सारे रास्ते बंद होने हैं, सारे नेताओं को सुबह ही पहुंचना है और यशवंत सिन्हा को देर हो जाती है। आधे रास्ते से उन्हें लौटना पड़ता है। और इस तरह अंत में मोदी-राजनाथ मुलाकात का रास्ता खुलता है। इसे कहते हैं ‘आधी सुल्तानी-आधी आसमानी’।




जेठमलानी नाम सत्य है




ये मामला भी कम आसमानी नहीं है कि गडकरी का विकेट लेने के बाद राम जेठमलानी अब शायद गडकरी के बैटिंग कोच भी बन रहे हैं।




इस नंबर की हेल्प करें




दिल्ली गैंगरेप कांड के बाद दिल्ली सरकार ने एक हेल्पलाइन नंबर शुरू किया था। ये अलग बात है कि इस नंबर को ज्यादा हेल्प नहीं मिल पाई, लेकिन जितनी देर तक यह नंबर बिना हेल्प चला, उतनी देर में इसकी बड़ी दुर्दशा हुई। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के मुताबिक इस नंबर पर कोई महिला गैस न मिलने की शिकायत कर रही थी, तो कोई ये शिकायत कर रही थी कि उसके पति अभी तक घर नहीं लौटे हैं। जब नंबर ठप्प हो गया, तो ज्यादातर पतियों ने राहत की सांस ली।




विधि आयोग के अगले अध्यक्ष




रिटायर्ड जस्टिस डीके जैन विधि आयोग के अगले अध्यक्ष हो सकते हैं। सुना है कि प्रधान न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने उनके नाम की संस्तुति भेजी है।

कौन जाए जौक..




पूवरेत्तर में तीन हाइकोर्ट बनने जा रही हैं। मणिपुर, त्रिपुरा व मेघालय। लेकिन त्रिपुरा और मेघालय में विधानसभा चुनाव होने हैं। तीनों हाइकोर्ट सिक्किम की तरह छोटी होंगी। देखते हैं इनका चीफ जस्टिस कौन-कौन बनता है। क्योंकि वो पुराना शेर है न- कौन जाए दिल्ली की गलियां छोड़कर।

बिना बीमे, हम धीमे




बीमा नियामक व विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) के चेयरमैन की कुर्सी के लिए कोई दीदावर अभी तक चमन में नहीं आया है। पी. चिदंबरम किसी ब्यूरोक्रेट को आने नहीं दे रहे हैं। उन्होंने नाम बढ़ाया है टीएस विजयन का। और उनके नाम को सीवीसी क्लीयरेंस अभी नहीं मिली है।

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