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ममता के सुर

 
Source: डॉ. भारत अग्रवाल   |   Last Updated 09:55(16/01/12)
 
 
 
 
ममता बनर्जी चिंघाड़ती हैं, तो उसे अकेली कांग्रेस ही नहीं सुनती है। बहुत से लोग सुन लेते हैं। दरअसल ममता का स्वाभाविक सुर थोड़ा ऊंचा है। वह अपने दफ्तर में बैठकर जो बात करती हैं या नेताओं को डांटती-फटकारती हैं, वह बाहर इंतजार करने वाले साफ सुन लेते हैं। लेकिन अब दीदी ने अपने कमरे में साउंड प्रूफ दरवाजा लगवा लिया है। वह भी १ जनवरी को। न्यू ईयर रेजॉल्यूशन की तरह। अब खतरा सिर्फ दीवारों के कानों से है।

टैलेंटेड सीएम

ममता बनर्जी की मां के देहांत पर दुख जताने के लिए भाजपा के दो प्रवक्ता- राजीव प्रताप रूडी और शाहनवाज हुसैन कोलकाता गए थे। ममता से उनकी मुलाकात राइटर्स बिल्डिंग में सीएम के आगंतुकों के कक्ष में हुई। यहां ममता की बनाई पेंटिंग्स लगी हैं। रूडी ने ममता से ऐसी एक पेंटिंग कॉन्सटिट्यूशन क्लब में रखने की मांग की। ममता ने हामी भर दी और १५ दिन में खास तौर पर पेंटिंग भिजवा दी। अब यह स्टार लाउंज में लगी है और कॉन्सटिट्यूशन क्लब में किसी मुख्यमंत्री की बनाई पहली पेंटिंग है। इसे कहते हैं टैलेंटेड सीएम।

भाजपाई टैलेंट

वैसे टैलेंट भाजपा के मुख्यमंत्रियों में भी कम नहीं है। वे पेंटिंग कैसी बनाते हैं, ये तो पता नहीं, लेकिन मसूरी में लालबहादुर शास्त्री प्रशासन अकादमी (जहां आईएएस अफसरों की ट्रेनिंग होती है) में भाजपा के मुख्यमंत्रियों को राजनैतिक सुशासन पर भाषण देने के लिए बुलाया गया था। और गौर से सुनिए, बात नरेंद्र मोदी की नहीं हो रही है। ये बात है शिवराज सिंह चौहान और डॉक्टर रमन सिंह की।

पॉलिटिक्स प्रसाद

'राजनीति' माने 'पॉलिटिक्स' होता है। लेकिन क्या 'प्रसाद' माने 'बलि का बकरा' ही होता है? इस बार राज्यसभा में लालू के सांसद राजनीति प्रसाद जी, पॉलिटिकल 'प्रसाद' बनते-बनते रह गए। लोकपाल बिल पर हंगामा करने, बिल छीनने-फाडऩे की रस्म पूरी करने और लालूगर्दी करने की जिम्मेदारी उन्हें दी गई थी। लालूजी दीर्घा से सारी सुपरवाइजरी आधी रात तक करते रहे। सवाल यह था कि निहायत जूनियर राजनीति प्रसाद ही क्यों? जवाब बाद में मिला। वह यह कि लालूजी के कुल चार राज्यसभा सदस्यों में से राजनीति प्रसाद का कार्यकाल सिर्फ अप्रैल तक है। पॉलिटिक्स यह कि अगर लालूगर्दी करते हुए उनका 'प्रसाद माने...' चढ़ जाए, तो कोई खास नुकसान न हो।

सड़क की राजनीति

उत्तराखंड के सीएम मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी विधानसभा टिकटों का फैसला करवाकर दिल्ली से चले, तो उन्होंने हवाई मार्ग के बजाय सड़क के रास्ते जाने का फैसला किया। कहा गया कि सारे हाइवे उन्हीं के राज में बने थे और इसलिए वह हालात का जायजा लेना चाहते थे। लेकिन विरोधी कह रहे हैं कि जनरल साब को पता था कि नाराज कार्यकर्ता हवाई अड्डे पर घेराव कर सकते हैं। अब उनके पास तो कोई पॉलिटिकल प्रसाद है नहीं, लिहाजा खुद ही सड़क नापनी पड़ी।

देवी मिलें, तो प्रसाद चढ़े

और कुछ पॉलिटिकल प्रसाद ऐसे होते हैं, जो बिना चढ़े भी चढ़ाए हुए मान लिए जाते हैं। प्रवासी भारतीय सम्मेलन में केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर ढेरों सफाइयां दीं। एक ने पूछ लिया कि आप वित्त क्षेत्र में महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए क्या कर रहे हैं। प्रणब दा को मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई। तपाक से बोले- मैं अपनी जगह किसी महिला को वित्त मंत्री बनवाने के लिए तैयार हूं। जवाब हो गया। अब ढूंढ़ो कोई महिला। आज तक सिर्फ इंदिरा गांधी देश की महिला वित्त मंत्री रही हैं, वह भी मोरारजी देसाई के इस्तीफा देने के बाद के मौके पर।

मायावी पॉलिटिकल प्रसाद

और अब बात मायावी पॉलिटिकल प्रसादों की। कम से कम उत्तर प्रदेश में मायावती पत्रकारों को सवाल पूछने का मौका नहीं देतीं। वह प्रेस कांफ्रेंसों में लिखा हुआ वक्तव्य पढ़ती हैं और चल देती हैं। अब चुनावी सीजन में पत्रकार याद आने लगे हैं। प्रेस से बात करने के लिए सांसद वीर बादुर सिंह और सुधीन्द्र भदौरिया को आगे किया गया है। फिर एक बार 'प्रसाद माने...' चढ़ जाए तो कोई खास...।

एक और प्रसाद

प्रसाद की महिमा कितनी और बताएं। राज्यसभा में एक रविशंकर प्रसाद हैं, भाजपा वाले। कांग्रेस के राजीव शुक्ला के भाषण पर टोका-टाकी खेल रहे थे। राजीव शुक्ला उनके बहनोई हैं। लेकिन देखा-देखी विनय कटियार भी टोका-टाकी करने लगे। राजीव शुक्ला रविशंकर प्रसाद की टोका-टाकी तो झेलते रहे, लेकिन कटियार को उन्होंने झिड़क दिया। कहा- 'आप तो मेरे मित्र हैं। आप हमारे बीच में क्यों बोल रहे हैं?' सही बात है। आखिर वह विनय कटियार हैं। विनय प्रसाद कटियार थोड़े ही हैं।

सिब्बल की चुप्पी का राज!

बदनाम हुए तो क्या, नाम तो हुआ। और मायावती के हाथी के साथ यही हो रहा है। चुनाव आयोग ने पार्कों के हाथी ढांकने का निर्देश देकर उसे और प्रचार दिलवा दिया है। अगर आयोग आगे बढ़े, तो क्या हो? अजित सिंह की पार्टी का चुनाव चिह्न हैंडपंप है। मुलायम सिंह की पार्टी का साइकिल है। किसी का गैस सिलेंडर होगा, किसी का किताब, बल्ब, सूरज-चांद होगा। तब चुनाव आयोग क्या करेगा? सब यही बात कर रहे हैं। सिवाय कपिल सिब्बल के। भाई ने सोनिया गांधी के बारे में इंटरनेट पर पड़ी सामग्री पर बैन लगाने की बात की थी। उससे वह उल्टे और हिट हो गई थी।

एनआईसी डॉट आउट!

एनआईसी डॉट इन से आप जरूर परिचित होंगे। नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर। भारत की सरकारी वेबसाइट। बहुत बड़ा नाम था। अब गर्त में जा रही है। ज्यादातर काम आउटसोर्सिंग पर है। कोई नया अफसर, नया वैज्ञानिक जुडऩे को राजी नहीं है। कोई नया आइडिया, नया काम नहीं। पांच साल से एक ही महानिदेशक जमे हुए हैं। दो बार एक्सटेंशन मिल चुका है। दूसरी बार महज चार दिन में मिल गया। लेकिन खतरे की बात यह है कि विदेशी कंपनियां अब यहां के लोगों की कुंठा को भुनाने की फिराक में हैं। यहां से वैज्ञानिकों का बड़े पैमाने पर पलायन हो सकता है।
 
 
 
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