मोदी ट्रिक
डॉ. भारत अग्रवाल
| Mar 12, 2013, 15:25PM IST

मोदी इफेक्ट सचमुच नजर आ रहा है। राजनीति में भी और राजनीति के बाहर भी। क्या-क्या खेल हो रहे हैं, ये फिर कभी बताएंगे। सच यह है कि बहुत समय बाद पीएम पद का कोई अघोषित दावेदार दिल्ली यूनिवर्सिटी पहुंचा है। भाजपा वाले कहते हैं कि मोदी तो जादूगर हैं। और जादूगर हमेशा अपना जादू दिखाने के पहले काफी तैयारी करते हैं। जादूगर मोदी की एक ट्रिक हम आपको बताते हैं। दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में मोदी ने आधा खाली-आधा भरा गिलास वाला पुराना जुमला खारिज कर दिया। नया जुमला बहुत चर्चित भी हुआ। लेकिन ट्रिक यह थी कि इसके लिए मोदी पहले से तैयार थे और आधा भरा गिलास खुद हाथ में लेकर माइक तक पहुंचे थे।
आसमानी जादू
जादूगर मोदी के लिए कुछ जादू आसमानी भी हुआ। श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में मैनेजमेंट गुरु बनने के तीन दावेदार थे। कॉलेज के चेयरमैन 10 जनपथ के करीबी हैं और वे मोदी के धुर विरोध में थे। लेकिन छात्रों और फैकल्टी की वोटिंग में मोदी ने बाकी दोनों दावेदारों को पछाड़ दिया। प्रिंसिपल ने भी मोदी के पक्ष में राय दी। अंत में चेयरमैन साब मोदी का स्वागत करते रह गए।
कार्टून जो छपे नहीं
ममता बनर्जी ने हाल ही में अपनी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगाई। इसके बाद कोलकाता पुस्तक मेला लगा, तो उसमें भी दीदी की पांच पुस्तकों का विमोचन हुआ। ममतादी ने फेसबुक पर कोलकाता पुस्तक मेले का जिक्र किया, अपनी नई किताबों का हवाला भी दिया और ये भी बताया कि वे अब तक कुल मिलाकर 40 किताबें लिख चुकी हैं। अब कुछ लोग कह रहे हैं कि ये सेल्फ प्रमोशन है और लिहाजा मोदी इफेक्ट है। हम क्या कहें? दुआ ही कर सकते हैं कि काश इनके कार्टूनों का संग्रह भी कोलकाता पुस्तक मेले में रखा गया होता।
कुशाग्र बुद्धि
कोलकाता पहुंच ही गए हैं तो एक खबर और। बात वैसे तो पुरानी है, लेकिन पता अब चली है और आपको भी अच्छी लगेगी। जब प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की तैयारी कर रहे थे, तो उन्हें लगा कि इसके लिए अपने स्कूल के जमाने के मूल सर्टिफिकेटों की जरूरत पड़ेगी। बहुत खोजे, लेकिन सर्टिफिकेट कहीं नहीं मिले। बेटे से पूछा, तो उसे भी पता नहीं था। अंत में प्रणबदा ने कोलकाता विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर को फोन किया। वाइस चांसलर ने प्रणब मुखर्जी से पूछा कि क्या उन्हें याद है कि वे किस साल में पास हुए थे। जवाब में प्रणबदा ने न केवल साल, बल्कि रोल नंबर और रजिस्ट्रेशन नंबर तक बता दिया। इसे कहते हैं कुशाग्र बुद्धि।
वो हो भी सकता है
वैसे भाजपा के डॉ. मुरली मनोहर जोशी भी कम कुशाग्र बुद्धि नहीं हैं। लेकिन हाल ही की इनकी तारीफ ये है कि जोशीजी साध्वी प्रज्ञा वाले मामले पर एनआईए को खरी-खोटी सुनाने बैठे। पंडितजी ने मूलत: गुरुमूर्ति की रिसर्च का सस्वर कैमरोन्मुखी पाठ किया और फिर चलते-चलते हाफिज सईद को "श्री" हाफिज सईद कह दिया। यानी भाजपा वाले "श्री" हाफिज सईद कहने पर दिग्विजय सिंह का जो मजाक उड़ा लेते थे, अब उस पर फुल स्टॉप लग गया। तो क्या जोशीजी की जुबान फिसल गई थी? लगता तो नहीं है, पर हो सकता है।
कभी इधर थे, अब उधर
भाजपा की बात चली है, तो आपको 11 अशोका रोड ले चलते हैं। राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने के बाद से यहां राजनीति की चहल-पहल तेज है। हालांकि यहां के कर्मचारी थोड़े मायूस हैं। राजनाथ सिंह ने कोर ग्रुप की मीटिंग 11 अशोका रोड पर बुलाई। तमाम बड़े नेता आए। नितिन गडकरी भी आए। लेकिन इस बार उनको दूसरी कुर्सी पर बैठना पड़ा। अध्यक्ष वाली कुर्सी पर अब राजनाथ सिंह थे। वैसे एक बात आपको बताएं। जब गडकरी अध्यक्ष होते थे और कोर ग्रुप की मीटिंग बुलाते थे, तो कुछ बड़े नेता उससे नदारद रहते थे। लेकिन अब छोटे-बड़े सब आते हैं।
दिलदार गडकरी
और भाजपा मुख्यालय के कर्मचारी मायूस क्यों हैं? वे राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने से नहीं, बल्कि गडकरी की विदाई से दुखी हैं। गडकरी उनके लिए मसीहा थे। गडकरी ने न केवल सबके वेतन में वृद्धि कर दी थी, बल्कि एक कर्मचारी को बेटी के विवाह पर एक लाख रुपए भी भेंट किए थे और किसी को इसकी भनक नहीं लगने दी थी। बात का खुलासा तब हुआ, जब 11 अशोका रोड के कर्मचारियों ने पार्टी दफ्तर में बने नए ऑडिटोरियम में गडकरी को भावभीनी विदाई दी।
जस्टिस सिन्हा, जूनियर!
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा आपको याद हैं? वही जिन्होंने 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित कर दिया था। हां, तो उनके सुपुत्र हैं विनीत सिन्हा। हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों के कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनके एलिवेशन का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा हुआ है। दो महीने बीत चुके हैं। देखते हैं आगे क्या होता है?
बदला मिजाज
रोहिंटन नरीमन ने देश के सॉलिसिटर जनरल की नौकरी क्या छोड़ी, कानून मंत्री का व्यवहार ही बदल गया। यकीन न हो तो थोड़ा समय सुप्रीम कोर्ट के आसपास घूमकर
देख लें। सारे लोग इसी बारे में बातें करते रहते हैं।
...नहीं चाहिए
सुप्रीम कोर्ट में चार पद खाली हैं। प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। लेकिन सरकार ने एक एडवायजरी भेजी है कि एक राज्य के मुख्य न्यायाधीश का नाम कृपया न भेजा जाए।
बहुत काम है
अब बात लोकसभा की। जब सत्र नहीं चल रहा होता है, तो यहां के कई सारे कर्मचारियों का मुख्य धंधा जगजीवनराम ट्रस्ट की सेवा करना होता है। एक निजी सचिव तो पूरी तरह सिर्फ इसी का काम देख रहे हैं।
ट्रस्ट है, परंपरा नहीं
मेहनत तो खैर मेहनत ही है, लेकिन लोकसभा के कर्मचारी चाहे जितनी मेहनत कर लें, प्रमोशन के फिर भी लाले ही पड़े रहते हैं। यहां विभागीय प्रमोशन कमेटी का प्रस्ताव दो महीने से अटका पड़ा है। पहले प्रमोशन अपने आप हो जाने की परंपरा थी। लेकिन अब पिछले चार साल से यह परंपरा टूटी पड़ी है। वैसे कहा जाता है कि लोकसभा परंपराओं से ही चलती है।
डेपुटेशन-दर-डेपुटेशन
राजस्थान कैडर के 82 बैच के आईपीएस अफसर हैं केके शर्मा। चार-पांच महीने से डेपुटेशन पर बीएसएफ में आईजी के पद पर हैं। माना जा रहा है कि अब वे सीबीआई में जाने वाले हैं।







