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चुनाव के बाद भी

Dainik bhaskar.com | Jan 01, 2013, 09:55AM IST
चुनाव के बाद भी
"चुनाव के पहले भी, चुनाव के बाद भी"। हम गुजरात चुनाव की बात कर रहे हैं और निवेदन ये है कि अगर गुजरात के चुनाव में मोदी ने जोर का झटका धीरे से दिया था, तो अभी उसकी गूंज दो साल तक सुनाई देती रहनी है। यानी लोकसभा चुनाव के बाद भी। कथा इस प्रकार है कि गुजरात के चुनाव में नरेंद्र मोदी ने ३डी अभियान चलाया था। मोदी भाषण देते एक जगह थे, दिखाई 53 जगह पड़ते थे। आगे बात यह है कि ये तकनीक ब्रिटेन की जिस कंपनी ने मुहैया कराई थी, उसके साथ मोदी का दो साल का करार है। यानी 2014 के अंत तक। और सुनिए, गुजरात चुनाव में मोदी एक साथ 53 स्थानों पर नजर  आते थे। जरूरत पड़ी तो इनकी संख्या भी बढ़ाई जा सकती है।  
 
भाजपा ने रख ली चिदंबरम की लाज 
 
 और आपको पता है, गुजरात में मोदी हार गए हैं, कांग्रेस जीत गई है? यकीन  न हो तो आप एक तो शीला दीक्षित से पूछ सकते हैं, जो इसे साबित कर  चुकी हैं। दूसरे आप पी. चिदंबरम से पूछ सकते हैं, जो इसे पहले ही साबित  कर चुके थे। ये अलग बात है कि इनका है साबित करने का अंदाजे बयां  और। एक बानगी देखिए। मतगणना शुरू होने के फौरन बाद ही गृहमंत्री  चिदंबरम ने विचार व्यक्त कर दिया था कि कांग्रेस गुजरात व हिमाचल- दोनों राज्यों में जीत गई है। हिमाचल प्रदेश में तो सीधे ही जीत गई है और गुजरात  में इसलिए जीत गई है, क्योंकि भाजपा को पिछली बार की 117 सीटों से कम सीटें मिल रही हैं। बाद के रुझान में बीजेपी की सीटें 120 तक पहुंचती  नजर आईं और चिदंबरम के उच्च विचार खतरे में पड़ते नजर आए। लेकिन अंत में भाजपा ने 115 सीटें लाकर चिदंबरम की लाज रख ली।
 
पास हो गए कमलनाथ
 
नए संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ एफडीआई टेस्ट में पास हो गए। अब विपक्ष वाले भले ही कुछ भी कहें, लेकिन ये तो सच है ही कि एफडीआई पर बहस और मतदान मेंसरकार का बाल बांका नहीं हुआ। प्रमोशन में आरक्षण बिल भी राज्यसभा से पारित हो ही गया और सरकार के एक-दो और आर्थिक सुधारनुमा कानून भी पारित होगए। एक नए संसदीय कार्य मंत्री होने के नाते ये सचमुच काबिले तारीफ हैं। न मानो तो सपा-बसपा से पूछ लो। इस बात पर मुहर लगाने के लिए दोनों फौरन वाकआउट भी कर सकते हैं।
 
फैसिलिटी का टोटा
 
वैसे हमारा साफ मानना ये है कि बाहर से समर्थन और उसके भी बाहर से समर्थन, सपा-बसपा वाकआउट और इसी तरह की बाकी फैसिलिटीज हर पार्टी को मुहैया कराई जानी चाहिए। और सिर्फ संसद में ही नहीं, ये फैसिलिटीज हर जगह और हर समय उपलब्ध होनी चाहिए। इससे लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी। अगर ऐसा किया जाए, तो हमारे लोकतंत्र की चर्चा इस धरती पर ही नहीं, इस धरती के आगे की दुनिया में भी होने लगेगी। अब देखिए अगर ये फैसिलिटीज सभी पार्टियों को अपनी हर मीटिंग, पब्लिक मीटिंग, अधिवेशन, प्रेस कांफ्रेंस आदि में मिल जाएं, तो राजनीति कहां से कहां पहुंच जाए। न अनुशासन की समस्या रहे, न विद्रोह का खटका रहे। मान लीजिए प्रेस कांफ्रेंस में कोई ऐसा कुछ पूछ ले, जो अपनी दुखती रग हो, तो तुरंत कोई हंगामा हो और प्रेस कांफ्रेंस स्थगित हो जाए। कोई और सवाल उठाए, तो ऑटोमैटिक ढंग से बंद कमरे में सारे पत्रकारों की मीटिंग हो जाए। जरूरत पड़े, तो नारेबाजी शुरू हो जाए। वरना सुविधानुसार वाकआउट हो जाए। लेकिन अफसोस, ऐसी कोई फैसिलिटी है नहीं, लिहाजा कई नेता अपने एजेंडा को मन मसोसकर मन में दबाए बैठे हैं।
 
दिल बैठाने वाली बात
 
और तो और, इन फैसिलिटीज के अभाव में अपने पिछली बार के कॉलम वाले माननीयों को भी यातना झेलनी पड़ती है। जैसे लोकसभा में जब कंपनी कानून में संशोधन पर लंबी और थकाऊ बहस चल रही थी, तब ये फैसिलिटीज उपलब्ध ही नहीं थी। रात के 11 बजे तक (सोचिए, इतना तो आजकल बच्चे भी नहीं पढ़ते) लोकसभा चलती रही। अध्यक्ष की आसंदी पर सतपाल महाराज थे, जो पानी पी-पीकर बहस करवा रहे थे। और बेचारे बहस करने वाले क्या करते? वे बेचारे बार-बार "महाराज की जय हो’के नारे लगा रहे थे। है ना दिल बैठाने वाली बात? 
 
बाबा का खेल
 
अब आपको बताते हैं कुछ पर्दे के पीछे वाली फैसिलिटीज के बारे में। जैसे दो ताकतों ने मिलकर यह फैसिलिटी तैयार की कि हिमाचल में धूमल की हार जरूर हो। एक ताकत थे बाबा रामदेव और दूसरे थे कुल्लू रियासत के पूर्व राजा और पूर्व सांसद महेश्वर सिंह। मनाली की एक बड़ी हस्ती ने दोनों की मुलाकात एक विमान में करवाईथी। इसके बाद दोनों ने क्या गुल खिलाया, ये बाद में बताएंगे।
 
चेलों का खेल
 
चलिए इतना तो खैर आपको अभी बता देते हैं कि इस मुलाकात के बाद महेश्वर सिंह की मुलाकात दिल्ली के पास कांग्रेस के प्रभारी चौधरी बीरेंद्र सिंह से करवाई गई थी। क्या नाम था जगह का? हां, पटौदी रिजॉर्ट्स। यहीं हुई थी मीटिंग।अजीब झंझट है दिल्ली पुलिस के कमिश्नर नीरज कुमार के सामने भी दोहरी दिक्कत है।शीला दीक्षित तो खफा हैं हीं, राम जेठमलानी और सुब्राण्यम स्वामी भी उनके खिलाफ एक डॉजियर बनाकर पीएमओ और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार 
के पास भेज रहे हैं।
 
रशीद-राशिद-हबीब
 
दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर की कुर्सी को लेकर भी खींचतान शुरू हो गई है। सबसे ऊपर नाम चल रहा है वजाहत हबीबुल्ला का, जो अभी अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्षहैं। अगर उनकी कुर्सी खाली हुई, तो उसके लिए दौड़ में हैं- रशीद मसूद और राशिद अल्वी। 
 
हुक्मउदूली!
 
सुप्रीम कोर्ट के सारे जजों ने एक अनौपचारिक बातचीत में इस बात पर चिंता जताई है कि सरकारी अफसर उनके आदेशों पर अमल नहीं कर रहे हैं। दो का नॉमिनेशन चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर ने दो वकीलों को सीनियर एडवोकेट के लिए मनोनीत किया है।
 
एक साहब बरी हुए
 
महिला उत्पीड़न के आरोपी एक वरिष्ठ अधिकारी को हाल ही में बरी किया गया है। ये मामला लोकसभा सचिवालय का है।
 
साहबों का मिलन
 
सलमान खुर्शीद के घर पर क्रिसमस के पहले एक पार्टी हुई थी। इस पार्टी में सरप्राइज गेस्ट थे अंशुमान मिश्रा। मिश्रा को पहले कभी भाजपा से झारखंड से राज्यसभा का टिकट मिला था। लेकिन पत्ता कटने पर उन्होंने अरुण जेटली और मुरली मनोहर जोशी को खूब गरियाया था।
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