राष्ट्रपति के अधिकार से जुड़े 6 मिथक और उनका सच जानिए

नई दिल्ली. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल जुलाई में खत्म हो रहा है। उनकी जगह लेने के लिए कई नाम चर्चा में हैं। माना जाता है कि राष्ट्रपति केंद्र सरकार के इशारे पर काम करते हैं। लेकिन क्या भारत में राष्ट्रपति को रबर स्टाम्प मानना सही है? संविधान ने उन्हें कई अधिकार दिए हैं। 62 साल के भारतीय गणतंत्र में कई मौकों पर राष्ट्रपति ने परंपराओं और मिथकों को तोड़ा। स्वतंत्र और निष्पक्ष फैसलों से दिखाया कि राष्ट्रपति महज कठपुतली नहीं हैं। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप, केटीएस तुलसी, नटवर सिंह और सुब्रमण्यम स्वामी के नजरिये से जानें:
फांसी माफी में सरकार के फैसले से नहीं बंधे
मिथक: राष्ट्रपति फांसी की सजा को कम करने पर अपने विवेक से फैसला नहीं लेते हैं। सरकार जैसा कहती है, वह वैसा फैसला लेते हैं।
हालांकि, 2006 में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने यह मिथक तोड़ दिया। गृह मंत्रालय की सिफारिश नहीं मानी। राजस्थान में पत्नी, दो बच्चों और रिश्तेदार की हत्या करने वाले खेराज राम की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। उन्होंने दिखा दिया कि सरकार का फैसला राजनीतिक नफे-नुकसान पर आधारित था।
संसद में पारित कानून पर भी उठा सकते हैं सवाल
मिथक: कैबिनेट और संसद से पारित हर कानून को मंजूरी देने के लिए बाध्य हैं। यदि राष्ट्रपति उस पर सहमत नहीं हैं तो भी वह उसे खारिज नहीं कर सकते।
हालांकि, 1987 में ज्ञानी जैल सिंह राजीव गांधी सरकार के पोस्टल कानून से सहमत नहीं थे। उन्होंने इसे सरकार को नहीं भेजा। राष्ट्रपति के लिए किसी विधेयक को मंजूरी देने की समय सीमा नहीं है। उन्होंने इस विधेयक को अपने पास रोके रखा। बिल स्वत: ही रद्द हो गया। 2006 में भी ऐसा मामला सामने आया। एपीजे अब्दुल कलाम लाभ का पद रखने वाले की संसद सदस्यता बर्खास्त करने के विधेयक पर पूरी तरह सहमत नहीं थे। उन्होंने इसे लौटा दिया।
प्रधानमंत्री की नियुक्ति में बहुमत जरूरी नहीं
मिथक: राष्ट्रपति लोकसभा चुनावों में उभरे सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का न्योता देंगे। दल के नेता को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाएंगे।
हालांकि, यह पूरा सच नहीं है। राष्ट्रपति जिसे चाहें सरकार बनाने का न्योता दे सकते हैं। तीन प्रधानमंत्रियों चरण सिंह (1९८०), अटल बिहारी वाजपेयी (1996) और चंद्रशेखर (199०) के पास सदन में बहुमत नहीं था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जैल सिंह ने संसदीय दल का नेता चुने जाने से पहले राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बना दिया।
कैबिनेट की सिफारिश मानने को बाध्य नहीं
मिथक: यदि केंद्रीय कैबिनेट ने किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश की है तो वह इसे मानने के लिए बाध्य हैं।
हालांकि, अक्टूबर-1997 में यह मिथक भी टूट गया। तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने संयुक्त मोर्चा सरकार की सिफारिश को ठुकरा दिया। उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार को बर्खास्त करने से इंकार कर दिया। उन्होंने कैबिनेट के फैसले को अनुचित कहते हुए वापस भेज दिया। इंद्रकुमार गुजराल सरकार को मुंह की खानी पड़ी। उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने रहे।
केंद्रीय मंत्री को भी कर सकते हैं बर्खास्त
मिथक: उन्हें किसी मंत्री को हटाने का अधिकार नहीं है।
हालांकि, ऐसा नहीं है। राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री नियुक्त करने का अधिकार है। प्रधानमंत्री द्वारा चुने गए लोगों को ही वे मंत्रीपद की शपथ दिलाते हैं। लेकिन राजीव गांधी सरकार में राज्यमंत्री केके तिवारी के मामले में राष्ट्रपति ने अपनी ताकत दिखाई। तिवारी के बयान से राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह नाराज थे। तिवारी ने कहा था कि राष्ट्रपति भवन आतंकियों की शरणस्थली बन रहा है। जैल सिंह ने नाराज होकर राजीव को पत्र लिखा। सरकार बर्खास्त करने की धमकी दी। तिवारी को मंत्री पद से हटाना पड़ा।
सरकार के कामकाज में कर सकते हैं हस्तक्षेप
मिथक: राष्ट्रपति केवल मंत्रिमंडल की सलाह पर फैसले लेंगे। उन्हें केंद्र या राज्य सरकार के कामकाज में दखल देने का अधिकार नहीं है।
हालांकि, यह सच नहीं है। राष्ट्रपति सरकार के किसी भी फैसले से जुड़ी फाइल मंगवा सकता है। नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति थे तो भारत-पाक संबंधों पर पाकिस्तान में तैनात नटवर सिंह से सीधे रिपोर्ट लेते थे। नटवर सिंह शुरुआत में झिझके। लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर वह राष्ट्रपति को भी रिपोर्ट देने लगे। डॉ. कलाम राष्ट्रपति थे तो उन्होंने गुजरात दंगों के बाद नरोडा पाटिया का दौरा किया। राज्य से राहत कार्यों पर रिपोर्ट भी मांगी।






