प्रतिभाहीन लोगों में आत्मसम्मान भी घट जाता है और विश्वास की कमी के कारण मालिकाना अधिकार भी चला जाता है। दिलीप कुमार ने अपने जीवन में उस दौर में श्रेष्ठ अभिनय किया, जब उनके निर्देशक मेहबूब खान, बिमल रॉय, अमिय चक्रवर्ती रहे। ‘राम और श्याम’ के बाद जब दिलीप कुमार निर्देशक के निर्देशक हो गए, तब उनकी एक भी फिल्म महान नहीं बनी। गुरुदत्त इतने अच्छे निर्देशक थे कि उन्होंने स्वयं अपने को अच्छा अभिनेता सिद्ध कर दिया, जबकि वे दोयम दर्जे के अभिनेता थे। इसी तरह कमजोर अभिनेता मनोज कुमार उस समय तक सफल सितारे थे, जब तक निर्देशक मनोज कुमार अपनी निर्देशकीय कला के शिखर पर थे। उधर निर्देशक मनोज चूके, इधर मनोज सितारा धरती पर आ गिरा। बहरहाल, इस बदलते हालात के घटाटोप में भी चमक की महीन रेखा इसलिए नजर आ रही है कि अब प्रतिभाशाली निर्देशक नए कलाकारों के साथ अपने बलबूते पर सफल सार्थक फिल्में गढ़ेंगे। सलमान खान भी छोटे बजट की फिल्में बनाने जा रहे हैं। उनमें भी नए कलाकारों और निर्देशकों को अवसर मिलेगा। ‘कहानी’ नामक कालातीत सितारा फिर अपनी शक्ति प्रदर्शित कर सकता है।