गांवों में पढ़े-लिखे युवा एक सौ अस्सी डिग्री पर जाकर अपने लिए मौके तलाश रहे हैं। किसानों की बदहाली का रोना रोने की बजाए वे इन मौकों का भरपूर फायदा उठा रहे हैं। वे बता रहे हैं कि उनमें बेहतर बदलाव का माद्दा है, मुश्किल हालातों से निपटने का दम है।
गुजरात के चर्चित युवा सरपंच 23 वर्षीय हिमांशु पटेल को लीजिए। उनके गांव में हैं सीमेंट की सड़कें, मिनरल वाटर प्लांट और पंचायत की अपनी सिटी बस। सुख-सुविधाओं और संसाधनों के लिहाज से संपन्न गांव। वे कहते हैं कि हमें सिर्फ पांच साल का मौका है। वक्त कम है, काम ज्यादा। कुछ तो करके दिखाना ही चाहिए।
राजस्थान के पिंडवाड़ा के 18 साल के भंवर मालवीय बीएससी में पढ़ते हुए अपनी वैज्ञानिक बुद्धि को प्रयोगों में उलझाए रहते हैं। उन्होंने मोबाइल फोन को खेत की मोटर में जोड़कर एक डिवाइस बना दिया। इससे पिता को बार-बार खेत पर जाकर मोटर चालू करने से निजात मिल गई। इसके बाद सड़कों पर ओवरलोड वाहनों को टोल नाके से 500 मीटर दूर से पकडऩे की तकनीक विकसित कर ली।
वे कहते हैं, असुविधाओं का रोना रोने से क्या फायदा? बेहतर है समझ और साधनों का इस्तेमाल ही किया जाए। जयपुर के पास का चाकसू गांव। 26 वर्षीय प्रीतम कट्टा। बारहवीं की पढ़ाई के दौरान ही बाजार की तेजी-मंदी से किसानों को होने वाले नुकसान की तरफ ध्यान था। कट्टा ने अपने लिए संभावनाएं तलाशीं। वे इन दिनों जयपुर, इंदौर, दिल्ली, चंड़ीगढ़ व मुंबई में डायबिटीज रोगियों को ऑफसीजन में जामुन, व्हीट ग्रास की आपूर्ति में व्यस्त हैं।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. नीलम यादव कहती हैं, पुरानी पीढ़ी का नए प्रयोगों में विश्वास नहीं था। अब गांवों के युवा नई तकनीक और अनुसंधान में रुझान दिखा रहे हैं। कृषि उत्पादों में वैल्यूएडीशन का महत्व समझा है। लोकसेवा आयोग के सदस्य एच.एल. मीणा का मानना है कि आज का युवा चुनौतियों के साथ आगे बढऩा चाहता है। उसे शहरी युवाओं की तरह आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद ही पारिवारिक जिम्मेदारियां उठाना पसंद है।
तभी तो छत्तीसगढ़ में दुर्ग की सबा अंजुम भले ही मुफलिसी में पलीं। चुनौतियों का सामना किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर की हॉकी खिलाड़ी बनते हुए भारतीय टीम की कप्तान बनी। अब शादी कर रही है। उनमें ओलिंपिक खेलने की चाहत अभी बाकी है। हरियाणा में छोटे से गांव बुड़शाम का जसमेर गुलिया पहले कबड्डी में अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी बना। अब पारिवारिक जिम्मेदारियां उठाना चाहता है।
बनारस के पास बरवां गांव के कृष्ण कुमार भी बदलाव के प्रतीक बनकर सामने आए हैं। तभी तो मास्टर डिग्री लेकर दिल्ली में तीन साल नौकरी करने के बाद वापस गांव लौटे। वे अब आसपास के युवक-युवतियों को गांव में ही रोजगार के अवसर तलाशकर पलायन रोकने में लगे हैं। पढ़ाई के बाद नौकरी में ही तरक्की को देखने की एकतरफा सोच में भी बदलाव आया है। गुजरात में वड़ोदरा से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद ओमकारसिंह मदनसिंह पुवार ने सरडोई गांव में डेयरी के काम को संभाला।