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ये इश्क वाला लव क्या है...

सुधीर मिश्र | Feb 14, 2013, 10:05AM IST
ये इश्क वाला लव क्या है...

ये इश्क वाला लव क्या है। हाल ही में आई महेश भट्ट की फिल्म स्टूडेंट ऑफ द ईयर का एक गीत भर... जी नहीं। दरअसल फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सअप जैसे एप्स के साथ बड़े हो रहे युवाओं में प्यार की परिभाषाएं ही बदल रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि नई जनरेशन प्यार में उठने वाले भावनाओं के ज्वार को लेकर ज्यादा प्रैक्टिकल है। पुरानी पीढ़ी के मुकाबले ज्यादा सजग, दूरंदेशी और हर तरह की व्यावहारिकताओं को समझने वाली। इसके बावजूद वो पुराना वाला इश्क तो हो ही रहा है, जिसे यंगस्टर्स की भाषा में फिल्मकार इश्क वाला लव कहते हैं। अलग-अलग समय के साहित्य में रोमांस को तरह-तरह से पेश किया गया है। कहते हैं साहित्य समाज का आईना होता है। साहित्यकारों, शायरों, सूफी संतों, वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के नजरिए से भास्कर ने युवाओं के लिए क्रवैलेन्टाइन डेञ्ज के मौके पर यह खास रिपोर्ट तैयार की है, इश्क को समझने के लिए... 
 
शायरों और साहित्यकारों ने यूं बयां की मोहब्बत 
 
कैफी आज़मी 
 
बस एक झिझक है यही हाले-दिल सुनाने में, कि तेरा जिक्र भी आएगा इस फसाने में। बरस पड़ी थी जो रुख से नकाब उठाने में, वो चांदनी है अभी तक गरीबखाने में इसी में इश्क की किस्मत बदल भी सकती थी, जो वक्त बीत गया आजमाने में ये कहकर टूट पड़ा शाखे-गुल से आखिरी फूल, अब और देर है कितनी बहार आने में... 
 
इन पंक्तियों में कैफी साहब ने प्रेयसी को लेकर आशिक की फिक्र, मोहब्बत और तकलीफ को बेहद नजाकत के साथ पेश किया है। संवेदनशीलता देखिए कि आशिक अपना हाल-ए-दिल बयां करने से भी डरता है कि कहीं इस जिक्र से उसके माशूक की बदनामी न हो जाए। 
 
विलियम शेक्सपीयर 
 
मेरी प्रेमिका की आंखें सूरज के जैसी नहीं हैं, मूंगा भी उसके होठों से ज्यादा रंगीन है, बर्फ भी उससे ज्यादा सफेद है और काले बादलों का रंग भी उसके बालों से गहरा है, गुलाब भी उसके गालों से ज्यादा कोमल हैं, लेकिन फिर भी उसकी सांसों की महक मुझे इन सबसे अच्छी लगती है। मैं उसके चेहरे को पढ़ सकता हूं, मुझे उसमें नजर आता है समर्पण और प्यार, जिसके लिए मैं बरसों से प्यासा था। मुझे उसकी आवाज में संगीत की मिठास लगती है। मैंने कभी ईश्वर को नहीं देखा, लेकिन मैं अपनी प्रेमिका में उसके दर्शन पाता हूं। वो जमीन पर पैर रखती है तो ऐसा लगता है मानो स्वर्ग से उतर रही हो। हो सकता है कि यह सब मेरी कल्पना हो, लेकिन मैं उससे प्रेम करता हूं यह सच्चाई है। 
 
गुलज़ार 
 
नज़्म उलझी हुई है सीने में, मिसरे अटके हुए हैं होठों पर, उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह, लफ्ज़ कागजों पर बैठते ही नहीं। कब से बैठा हुआ हूं मैं सादे कागज पर लिखकर नाम तिरा बस तिरा नाम ही मुकम्मल है, इससे बेहतर भी नज़्म और क्या होगी 
 
यह इश्क एक और इंतहा है। इस नज्म में गुलज़ार साहब प्रेयसी की इस हद तक तारीफ करते हैं कि उसके नाम को ही नज्म मान लेते हैं। 
 
बाबा बुल्ले शाह 
 
रांझा-रांझा करदी नी मैं, आपे रांझा होई 
सद्दो नी मैनूं धीदो रांझा, हीर न आक्खो कोई 
 
बाबा बुल्ले शाह ने हीर रांझा के जरिए सूफियाना लहजे में रूहानी इश्क को बयां किया है। यह इश्क आम नहीं। इसमें माशूक वही है, जिसकी इबादत होती है। वह हीर के जरिए कहते हैं- रांझा-रांझा करते-करते अब तो मैं खुद ही रांझा हो गई हूं। इश्क की ये वो स्थिति है, जिसमे प्रेमदीवानी हीर खुद को रांझा में एकाकार मानती है। वह कहती है कि अब हीर तो कोई है ही नहीं। वो तो रांझा हो गई। बुल्लेशाह इसे इश्क-ए-हकीकी कहते हैं। 
 
मिर्जा गालिब 
 
उन के देखे से, जो आ जाती है मुंह पर रौनक, 
वह समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है... 
 
गालिब इन पक्तियों में महबूब से आशिक की जुदाई की तकलीफ बयां कर रहे हैं। उसे जान के लाले पड़े हुए हैं। ऐसे में अगर उसका महबूब उसे देखने के लिए आ जाता है तो महबूब को देखते ही आशिक के चेहरे पर रौनक सी आ जाती है। माशूक इस रौनक को देखकर समझती है कि रोगी का हाल अच्छा है। फिक्र की कोई बात नहीं। आशिक मन ही मन सोच रहा है कि यह रौनक तो उसके आने से आई है, उसके जाने के बाद फिर क्या होगा। यह भी इश्क की एक चरम अवस्था है जिसे गालिब ने बेहद खूबसूरती से बयां किया। 
 
साहित्य में रोमांस 
 
प्यार। कहने को ढाई अक्षर। मगर इजहार करना हो तो स्याही पूरी न पड़े और पन्ने खत्म हो जाएं। भारतीय साहित्य के चर्चित रोमांटिक उपन्यासों में सारा कुछ कहने के बाद भी जाने क्यूं प्रेम का इजहार अभी भी अनकहा, अनबोला और अनलिखा ही जान पड़ता है। फिर भी प्यार को ध्यान में रखकर रची गई यह कृतियां दिल के गिटार पर दीवानगी के सुर जरूर छेड़ती हैं। कभी तकियों को भिगोती हैं तो कभी किसी आपबीती से जोड़कर काफी कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है। गुनाहों का देवता, शेखर एक जीवनी, नदी के द्वीप, बाणभट्ट की आत्मकथा और देवदास ऐसे ही रूमानी उपन्यास हैं जिन्हें कालजयी माना जाता है। शोधार्थी हेमन्त हवन ने इन उपन्यासों में से ऐसे बेहतरीन अंश चुने हैं। इनके जरिए महसूस करिए इन उपन्यासों में रचे-बसे इश्क को- 
 
सबसे पहले जिक्र गुनाहों का देवता का। चंदर के विवाह ने सुधा को खत्म सा कर दिया है। चंदर कहता है-अगर तुम मेरी बाहों की सीमा में रही और मैं तुम्हारी पलकों की छांव में रहा और बाहर के संघर्षों से हम डरते रहे तो कायरता है। और, क्या मुझे अच्छा लगेगा कि दुनिया कहे कि मेरी सुधा जिस पर मुझे नाज था, वह कायर है? सुधा सिर्फ यही कहती है-तुम्हें मेरी जरूरत नहीं थी। तुम पर भार हो उठती थी मै। मैंने अपने को खींच लिया, अब कभी तुम्हारे जीवन में आने का साहस नहीं करूंगी... अगर पुनर्जन्म नहीं है तो बताओ मेरे देवता, क्या होगा? करोड़ों सृष्टियां होंगी, प्रलय होंगे और मैं अतृप्त चिनगारी की तरह असीम आकाश में तड़पती हुई अंधेरे की हर परत से टकराती रहूंगी, न जाने कब तलक के लिए लिए। प्रेम में डूबे इस उपन्यास का भाव यह है कि अलगाव, दूरी, दुख और पीड़ा आदमी को महान बना सकते हैं। भावुकता और सुख से हम ऊंचे नहीं उठते। 
 
कुछ इसी तरह सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय का उपन्यास क्रनदी के द्वीपञ्ज है। इस ट्राएंगल लव स्टोरी में गौरा युवा वैज्ञानिक भुवन को बहुत चाहती है। कह नहीं पाती और आखिर में सिर्फ संकेतों से अपनी बात कहती है। वह कहती है क्रशब्द अधूरे हैंञ्ज क्योंकि उच्चारण मांगते हैं। मैं कह नहीं सकती थी, पर लिख सकती थी चाहती तो। लेकिन आप कहलाना चाहते हैं। लीजिए मैं सोच रही थी किसी तरह, कुछ भी करके, अपने को उत्सर्ग करके आपके घाव भर सकती तो जीवन को सफल मानती। यह बात कहते हुए रेखा के दिल की धक-धक केवल वही सुन सकता है जिसने अपने प्यार का बलिदान किया हो। हजारी प्रसाद द्विवेदी की बाणभट्ट की आत्मकथा, शरतचंद्र की देवदास और शेखर एक जीवनी भी रोमांस के मामले में माइलस्टोन माने जाते हैं। 
 
इश्क मतलब केमिकल लोचा 
 
वैज्ञानिक भी मानते हैं कि प्यार अंधा होता है। फैरिस स्टेट यूनिवर्सिटी मिशिगन के वैज्ञानिक रॉबर्ट फ्रेयर ने कई प्रयोगों से यह साबित किया। एक खास किस्म के न्यूरो केमिकल, फिनाइल इथाइल एमीन की वजह से व्यक्ति को प्रेमी की तमाम खामियां दिखना बंद हो जाती हैं। उसकी हर बात प्यारी लगती है। रोचक बात यह है कि रसायन का स्तर धीरे धीरे कम होता जाता है। चार पांच साल बाद तो इसका प्रभाव शरीर से बिलकुल खत्म हो जाता है। 
 
इश्क का जादू सिर्फ चार मिनट में 
 
डॉ. फिशर के मुताबिक प्रेमियों के आकर्षण का जादू 90 सेकंड से लेकर चार मिनट में चल जाता है। इस आकर्षण में 55 प्रतिशत योगदान उनके हाव-भाव का होता है। 38 फीसदी बातचीत की गति और लहजे तथा सिर्फ सात फीसदी इस पर निर्भर करता है कि आपने बोला क्या। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रेम में आकर्षक होना बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। सबसे खास है सौम्यता और बुद्धि। 
 
प्‍यार में दीवानापन 
 
 
जर्मन दार्शनिक फै्रडरिक नीत्शे के मुताबिक में प्यार में कुछ न कुछ पागलपन जरूर होता है। यह जरूर है कि हर पागलपन का कोई न कोई कारण होता है। असल में जब व्यक्ति को किसी से प्यार होता है तो उसके दिमाग में कुछ अलग ही किस्म की हलचलें होती हैं। वह सामान्य से कुछ अलग हो जाता है। इसी को शायद दीवानापन कहते हैं। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के शोधकर्ता एंड्रियाज बार्टेल और सैमी जैक के मुताबिक इस दीवानेपन के दौरान दिमाग का वह हिस्सा सबसे ज्यादा सक्रिय होता है जो कोकीन जैसा नशा लेने के बाद अजीब सी अनुभूति का अहसास कराता है। 
 
आंखों और नाक की खास भूमिका 
 
प्यार में भावनाओं और संवेदनाओं के अलावा आंखों व नाक की बड़ी भूमिका होती है। मनोवैज्ञानिक आर्थर एरॉन ने दो अनजान लोगों को 90 मिनट तक बातचीत करने और फिर चार मिनट तक एक-दूसरे की आंखों में देखने को कहा। शोध से पता चला कि काफी लोग आंखों में देखने से एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। इसी तरह प्यार में सिर्फ नजरों के तीर ही नहीं चलते। हर व्यक्ति की अलग गंध होती है जो त्वचा से निकलती है। नाक के जरिए गंध दिमाग में जाती है। दिमाग उस गंध को डीकोड करके दूसरे व्यक्ति के जींस की बनावट को समझता है और यह तय करता है कि वह आपका सच्चा साथी होगा या नहीं। 
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