मनमोहन ने खोया अपना संकटमोचक

नई दिल्ली. पिछले साल अगस्त में जब केंद्र सरकार अन्ना हजारे के अनशन से जूझ रही थी तब विलासराव देशमुख ही मनमोहन सिंह के संकटमोचक बने थे।
देशमुख दिल्ली और महाराष्ट्र के बीच में कांग्रेस की सबसे मजबूत कड़ी थे। अन्ना हजारे भी महाराष्ट्र में विलासराव देशमुख के काफी करीब थे। पिछले साल अगस्त में दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे अनशन पर बैठे थे। उनके समर्थन में लाखों लोगों का हुजुम उमड़ रहा था। केंद्र सरकार के लिए अनशन तुड़वाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया था।
मनमोहन सरकार के मंत्रियों से कई दौर की वार्ताओं के बाद भी अन्ना अनशन पर अडिग थे। केंद्र सरकार के उस मुश्किल वक्त में विलासराव देशमुख ने ही अन्ना हजारे से अंतिम बातचीत की थी और उन्हें अनशन तोड़ने के लिए मनाया था। विलासराव देशमुख देर रात अन्ना के मंच पर पहुंचे थे और अन्ना हजारे को प्रधानमंत्री का पत्र दिखाया था। देशमुख के ही भरोसे पर अन्ना हजारे ने मनमोहन सरकार की अनशन तोड़ने की मांग मान ली थी।
इस बार जब अन्ना हजारे दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे तब विलासराव देशमुख की तबियत खराब थी। हालांकि इस बार केंद्र सरकार ने भी अन्ना हजारे से किसी रूप में बातचीत नहीं की। अब अन्ना के अनशनों का आंदोलन भी समाप्त हो गया है और विलासराव देशमुख ने भी दुनिया से विदा ले ली है।
लेकिन देशमुख की मौत महाराष्ट्र कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है। उनकी न सिर्फ संगठन पर मजबूत पकड़ थी बल्कि वो महाराष्ट्र और दिल्ली के बीच सक्रिय कड़ी भी थे।
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