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मिशन 2014 के लिए राहुल का रास्ता?

पुण्य प्रसून वाजपेयी/अमित मिश्रा | Oct 31, 2012, 08:55AM IST
 
 

नई दिल्ली.  कांग्रेस को युवा नेता राहुल गांधी (ANALYSIS : मंत्रिमंडल में बदलाव पर दिखा राहुल का असर) से बहुत आस है। उनकी पार्टी कांग्रेस के भीतर और बाहर कई लोग उन्हें 2014 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर देखते हैं। लेकिन राजनीति के सफर में राहुल का रास्ता आखिर क्या हो सकता है, इसको समझने की कोशिश की है वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने।  (ईंट का जवाब पत्‍थर से दूंगा: गडकरी)
 
जिस शख्स की पहचान कतार में खड़े होने की जगह कतार को अपने पीछे खड़े करने की हो, वह शख्स मनमोहन सिंह के मंत्रियों की कतार में कैसे खड़ा हो सकता है? लेकिन उस शख्स का अपना रास्ता क्या होगा? जो शख्स पारंपरिक या खांटी राजनेताओं के चंगुल से कांग्रेस को मुक्त कराकर युवाओं के हाथ में कांग्रेस को मजबूत होते हुए देखना चाहता हो, उस शख्स का रास्ता अब क्या होगा? जो शख्स किसानी राजनीति के जरिए कांग्रेस की पहचान लौटाने में भरोसा करता रहा और नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक की मिश्रित अर्थव्यवस्था को ही देश की अर्थव्यवस्था की नब्ज मानकर संगठन में भाषण देता रहा, उस शख्स का रास्ता अब किस तरफ जाएगा? जाहिर है, ये ऐसे सवाल हैं, जिन्हें राहुल गांधी ने उठाया और अब यही सब सवाल राहुल गांधी के सामने आ खड़े हुए हैं।
 
राहुल गांधी (अब है राहुल गांधी के इम्तिहान का समय) कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बन सकते हैं। लेकिन यह सिर्फ एक पद है। और पद राहुल गांधी की मजबूरी नहीं है। वह कांग्रेस संगठन को मथने का समूचा दारोमदार उठा सकते हैं। राहुल गांधी हारे हुए राज्यों में कांग्रेस के अनुकूल समीकरण बनाने में व्यस्त हो सकते हैं। लेकिन यह सिर्फ जिम्मेदारी का एक भाव है। वह कांग्रेस के महासचिव होकर भी हर पद, हर जिम्मेदारी से ऊपर रहे है। तो सवाल है कि जो रास्ता राहुल गांधी को अपने लिए बनाना-दिखाना है उसकी जरूरत आज क्यों महसूस की जा रही है। क्या यह कांग्रेस की सरकार होकर भी कांग्रेस की नीतियों वाली सरकार नहीं लगती है। या फिर मनमोहन सिंह ने आर्थिक जीवन की एक ऐसी बड़ी लकीर खींच दी है, जिसके सामने पहली बार सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक सरोकार भी छोटे हो चले हैं। संयोग से कांग्रेस की राजनीति नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक के दौर में कभी आर्थिक मंत्र के आसरे नहीं चली।
 
 
 

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