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विश्व जल दिवस आज: पढि़ए पानी बचाने की कुछ प्रेरक कहानियां

Bhaskar News | Mar 22, 2012, 09:03AM IST
 
 


हर व्यक्ति को हर रोज 145 लीटर पानी चाहिए। खेती के लिए और भी ज्यादा पानी चाहिए । अभी मिल भी रहा है। लेकिन कब तक? क्योंकि जमीन का पानी धीरे-धीरे सूख रहा है। बरसात के दिन घट रहे हैं। संकेत साफ हैं। अगर आज से ही पानी बचाना शुरू करेंगे तो निश्चित ही कल सूखा नहीं रहेगा। दैनिक भास्कर अपने पाठकों के जरिए जल सत्याग्रह अभियान में जुटा है ऐसे जल सैनिकों के जज्बे और जुनून को आगे बढ़ाने में। विश्व जल दिवस के मौके पर आइए मिलते हैं इनसे। खेती के तौर तरीके हों या रोजमर्रा के काम। कैसे छोटी-छोटी आदतों में बदलाव लाकर अपने क्षेत्रों को जल संकट से उबार सकते हैं? पढिए कुछ ग्राउंड रिपोर्ट और दैनिक भास्‍कर समूह के चेयरमैन का विशेष संपादकीय


सिंचाई खुद के बनाए तालाब से, पीने के लिए हैं कुएं और हैंडपंप
 
कभी बूंद-बूंद पानी के लिए तरसने वाले बरलाई के लोगों ने अपने स्तर पर तालाबों को विकसित किया और जल संकट को खत्म कर दिया। अब यहां फसलें लहलहा रही हैं। मनासा तहसील मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर स्थित बरलाई में गंभीर जल संकट था। 1992 में गांव के मोहनलाल पाटीदार ने बारिश का पानी रोकने के लिए 1 एकड़ में तालाब बनाया और इसी पानी से बेहतर फसलें प्राप्त कीं। उनकी सफलता देख गांव में तालाब बनाने की होड़ मच गई। देखते ही देखते गांव में करीब २५० तालाब बनाए गए। इससे जल संकट से गुजर रहे गांव की सूरत ही बदल गई।  
गांव के ही विष्णु पाटीदार बताते हैं 15 हैक्टेयर जमीन पर आठ लाख की लागत से तीन तालाब बनाए गए । उन्हें 30 हजार फीट पाइप लाइन डालकर कुएं से जोड़ दिया। इसके अलावा अनेक किसानों ने सरकार की खेत-तालाब योजना से भी तालाब खुदवाए हैं। तालाबों का कैचमेंट एरिया इतना अच्छा है कि बारिश का 80 फीसदी पानी रोका जा रहा है। जिससे एक हजार एकड़ से अधिक भूमि की सिंचाई हो रही है। साथ ही हैंड पंप, ट्यूबवैल और कुओं में भी पर्याप्त पानी रहने लगा है। अब लोगों ने अपनी आदतों में बदलाव कर लिया है। वे सिंचाई के लिए पानी तालाब से ही ले रहे हैं। अन्य स्रोतों का उपयोग पीने के पानी के लिए हो रहा है। (मनासा, मध्‍य प्रदेश से विवेक सोनी की रिपोर्ट)
 
रेत से बर्तनों की सफाई, जल बचत की परंपरा लौट आई
10 साल पहले खेत में 20 फीट गहरा कुंड बनवाया था। इसी कुंड में बरसाती पानी इकट्ठा कर लेते हैं। किसान, पशु पालक, राहगीर व कई बार सेना के जवान भी इसी कुंड से प्यास बुझाते हैं। ऐसे कुंडों पर एक लंबी रस्सी बंधी बाल्टी रखी रहती है। जिससे पानी निकाला जा सकता है।
सिंगरासर के 73 वर्षीय पतराम भादू बताते हैं कि सूरतगढ़ तहसील के टिबा क्षेत्र के गांव सिंगरासर सहित अन्य क्षेत्रों में अक्सर पीने के पानी का संकट रहता है। इसीलिए लोगों ने घरों व खेतों में कुंड (टांके) बना रखे हैं, जिसमें बारिश का पानी एकत्र कर लिया जाता है। बारिश नहीं होने या कम होने पर यही कुंड सहारा बनते हैं। कुंड के पास एक खेळी बनाई जाती है। जिसमें नीचे गिरने वाला पानी इकट्ठा होता जाता है, जिसे पशु, पक्षी व वन्य जीव पीते हैं।
पानी बचाने के तरीके भी अनोखे हैं । रावला क्षेत्र के गांव ९ पीएसडी में गोमतीदेवी ने पानी व साबुन की बजाय रेत से बर्तन साफ करने की परंपरा घर में कायम कर रखी है। इससे जहां पानी की बचत होती है वहीं रेत से हाथ भी खराब नहीं होते। अपनी पढ़ी लिखी बेटियों को भी उन्होंने यही सीख दी है।
यहां के कार्यालय में भी बरसाती पानी को सहेजने के लिए डिग्गी (छोटे भूमिगत पानी के टैंक) बनाई गई हैं। छत से पाइप के सहारे पानी को इन डिग्गियों में पहुंचा दिया जाता है। फिर साल भर इस पानी का उपयोग पीने और रोजाना के कामों में किया जाता है।  (श्रीगंगानगर से रिपोर्ट)
पानी के लिए आए पैसे, पानी में ही गए 700 करोड़
 

 
 
 

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