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खुदकुशी का ख्याल छोड़ बन गए कहानीकार

 
Source: अखंड प्रताप सिंह   |   Last Updated 07:20(09/02/12)
 
 
 
 
जालंधर.‘खाली हाथ हूं चला जहां से रही न कोई निशानी, कल को मेरा साथी होगा भाखड़ा नहर का पानी।’ जिंदगी से निराश होकर २४ साल का एक युवा दो पंक्तियां लिखकर भाखड़ा नहर में छलांग लगा देता है। काल इस युवक को कबूल नहीं करता है। आसपास कुछ लोग थे, जिन्होंने युवक को बाहर निकाल लिया। मौत को गले लगाने का यह दूसरा प्रयास था। इससे पहले भी वह एक बार कालका पहाड़ी पर चाकू से खुद को गोदकर जान देने का प्रयास कर चुका था।




काल ने तब भी गाल में समाने से इनकार कर दिया था। जिंदगी को नासूर समझने वाले इस युवक ने बाद के दिनों में खुद से खुद को मरहम लगाया। आप जानना चाहेंगे वह युवा कौन थे? वह थे स्वरूप सियालवी। मंगलवार को जालंधर में इन्हें गुरदास राम आलम अवार्ड-२क्१क् से नवाजा गया। आज के यह ख्यातिनाम कथाकार मूलत: मोहाली जिले के सियालवी गांव के हैं। बोले, बचपन में उनके गांव में विनोबा भावे आए थे। वहां गीता प्रवचन की पुस्तक बिक रही थी।



सेना में तैनात पिताजी से रोकर पैसे मांगे और किताब खरीदी। उस किताब को कई बार पढ़ा और जीवन को दूसरे की मदद और सहायता में लगा दिया। लेकिन, जब कभी लगता कि मेरा उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा, खुद को भगवान को समर्पित कर देने का विचार आता। मौत ने भी दो बार धोखा दिया तो जीने का सहारा ढूंढने लगे। साहित्य में जीवन का प्रकाश नजर आया। फिर क्या था.. साहित्य पढ़ाना शुरू कर दिया। यह घटना वर्ष 1968 की है।



वर्ष 1969 में उन्हें एजुकेशन डिपार्टमेंट में क्लर्क की नौकरी मिल गई। नौकरी करते हुए पंजाबी में एमए किया और बीएड भी कर लिया। वर्ष 1971 में शादी हो गई। 1989 में सीनियर सेकेंडरी स्कूल में टीचर बन गए। साहित्य का अनवरत अध्ययन जारी रहा। वर्ष 1995 में लेक्चरर बन गए। उसी वर्ष लकीर मैग्जीन में पहली कहानी ‘रेप’ छपी। बहुत चर्चित हुई यह कहानी। फिर तो लेखन का सिलसिला चल पड़ा। वर्ष 2001 में कहानी संग्रह ‘पिंड अजे जिउंदा है’ का प्रकाशन हुआ। 2007 में कविता संग्रह ‘याद करो उस बेले नूं’ और वर्ष 2009 में ‘अंधेर के वासी’ कहानी संग्रह प्रकाशित हुई। वर्ष 2009 में सियालवी को डा. अंबेडकर इंटरनेशनल मिशन लिटरेरी अवार्ड मिला। सियालवी की पत्नी गृहणी हैं। दो लड़कियां हैं, दोनों की शादी हो चुकी है। बेटा बिजनेस करता है।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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